ज्ञान क्या होता है तथा ज्ञान के प्रकार ?

ज्ञान शब्द की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है उस पर अनेक शिक्षाविदों ने ज्ञान की अलग-अलग परिभाषा अपने अनुसार दी है। ज्ञान के अंतर्गत ज्ञाता और ज्ञे का पारस्परिक संबंध माना जाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक ज्ञान में एक ज्ञाता और ज्ञे होता है। ज्ञाता ज्ञान प्रदान करने के लिए ज्ञे से विभिन्न माध्यमों के द्वारा संपर्क स्थापित करता है।

इस संपूर्ण प्रक्रिया में ज्ञे की ज्ञानेंद्रियों का विशेष योगदान होता है। अपनी ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से भी यह ज्ञान को ग्रहण करता है। ज्ञान ज्ञानेंद्रियों श्री जो प्रत्यक्ष एवं अनुभव द्वारा प्राप्त होता है उसी को हम सामान्य रूप से ज्ञान कहते हैं। ज्ञान शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ज्ञे धातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है जानना। ज्ञान को हम तीन भागों में बांट सकते हैं सीखना या सूचना, जानना और बुद्धिमता।

ज्ञान के प्रमुख भाग

#1 सीखना या सूचना

प्रत्येक व्यक्ति अपने दिन भर में अनेक सूचनाओं का संकलन करता है और सूचनाओं के द्वारा ही हम कई प्रकार का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह ज्ञान किसी भी वस्तु, स्थान, घटना, समय या पर्यावरण से संबंधित हो सकता है। इसमें एक व्यक्ति सूचनाओं को एकत्रित करता है और दूसरे व्यक्ति को सूचित करता है। यह कार्य अशिक्षित व्यक्ति के लिए भी संभव है। उदाहरण - हम सोचते हैं कि रेलवे स्टेशन पर कार्य करने वाले कुली के पास प्रत्येक ट्रेन के आने जाने की सूचना होती है, वह अशिक्षित है परंतु फिर भी अपने कार्य में दक्ष है। इस प्रकार के ज्ञान में तथ्यों तथा आंकड़ों का महत्वपूर्ण ज्ञान होता है।

#2 जानना

जानना ज्ञान का वह रूप है जिसके अंतर्गत हम स्थूल या सूक्ष्म जानकारी प्राप्त करते हैं तथा तथ्यों का अर्थ पूर्ण ढांचा खड़ा करते हैं। यह वास्तविकता को प्रदर्शित करता है। हम प्रतिदिन अनेक प्रकार की जानकारी प्राप्त करते हैं। जैसे - हम प्रतिदिन देखते हैं कि सूर्य पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है। प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु के पश्चात वर्षा ऋतु आती है और वर्षा ऋतु के पश्चात शीत ऋतु का आगमन होता है। इस प्रकार यह सामान्यतया ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ग्रहण करता है। इस प्रकार के ज्ञान से व्यक्ति की मानसिक वृद्धि होती है। यह ज्ञान मध्यम श्रेणी का ज्ञान होता है।

#3 बुद्धिमता

मनुष्य में मुख्य बुद्धिमता का ज्ञान मानसिक तथा बौधिक विकास के साथ आता है। यह सूचनाओं और जानने पर आधारित होते हुए भी बुद्धिमता मानवीय जीवन के अनुभव की चोटी है अर्थात व्यक्ति ने बुद्धिमता की वृद्धि अनुभव के माध्यम से होती है। बुद्धिमता को एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है जैसे हम सभी यह मानते हैं कि कौवे का रंग काला होता है, लेकिन एक दार्शनिक स्थल के प्रत्येक पहलू को ध्यान में रखते हुए यह कहता है कि कौवा पांच रंग का होता है।

उसका यह कथन दूसरों से बिंदु होते हुए भी सत्य है क्योंकि उसने कौवे को बाहरी रंग के साथ-साथ उसके शरीर के आंतरिक अंगों का भी सम्मिलित किया है, क्योंकि कौवा बाहर से काला है किंतु उसकी हड्डियां सफेद है, उसका खून लाल है, उसकी नसों का रंग नीला है और चर्बी का रंग पीला है। इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक अनुभव जीवन और संसार से संबंधित है तथा बुद्धिमता का परिचायक है।

ज्ञान से संबंधित परिस्थितियां

जब कोई प्रतिज्ञप्ति की अवधारणा होती है तब प्रतिज्ञप्ति सदैव सत्य होनी चाहिए। तभी वह ज्ञान का रूप लेती है इसमें अनेक प्रतिज्ञप्ति हो सकती है, किंतु उनकी सत्यता के विषय में हमें सटीक जानकारी नहीं होती है। इंसान सामान्य तौर पर इनकी सत्यता के विषय में विश्वास कर लेते हैं किंतु सत्यता में विश्वास होना ही ज्ञान नहीं है, क्योंकि प्रमाणित करने के लिए तथ्यों की जांच आवश्यक होती है। कोई भी तथ्य जांच के पश्चात सत्य सिद्ध होता है तो वह सिद्धांत का रूप ले लेता है।

ज्ञान के प्रकार

ज्ञान को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है सामान्य ज्ञान एवं विशेष ज्ञान।

#1 सामान्य ज्ञान

सामान्य ज्ञान को भी हम दो भागों में बांट सकते हैं।*

( a ) बौद्धिक या प्रागानुभविक ज्ञान

यह ज्ञान बुद्धि पर आधारित होता है इस ज्ञान को हम बिना अनुभव के भी ग्रहण कर सकते हैं। इस ज्ञान के उदाहरण हमें गणित के क्षेत्र में और अंग्रेजी के क्षेत्र में देखने को मिलते हैं। जैसे - छोटा बालक जब पहली बार विद्यालय जाता है, तब उसको अंग्रेजी वर्णमाला, गिनती सिखाई जाती है। बालक धीरे-धीरे अपनी बुद्धि के अनुसार उनको सीखता है। जैसे-जैसे बालक की बुद्धि का विकास होता है वैसे - वैसे उसके ज्ञान के क्षेत्र में भी वृद्धि होने लगती है। इसके अलावा हमारे दैनिक जीवन में बहुत ऐसा ज्ञान है जो हम अपनी बुद्धि के माध्यम से ही ग्रहण करते हैं। 

( b ) प्रायोगिक ज्ञान

यह ज्ञान अनुभव एवं प्रयोग पर आधारित होता है। इस ज्ञान को हम अपनी इंद्रियों के माध्यम से ग्रहण करते हैं तथा मनुष्य अपने अनुभव का अवलोकन व निरीक्षण के माध्यम से इस प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करता है। भारतीय दर्शन के अनुसार ज्ञान को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है।

  1. परा विद्या :- इस प्रकार का ज्ञान इस भौतिक संसार से संबंधित है, इस भौतिक ज्ञान की प्राप्ति हमें ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से होती है। इस ज्ञान को अलौकिक ज्ञान भी कहते हैं।
  2. अपरा विद्या :- अपरा विद्या का संबंध दूसरे लोक से है। इसके अंतर्गत आत्मा और परमात्मा से संबंधित ज्ञान को प्राप्त करने से अथार्थ इस ज्ञान से आत्मा और परमात्मा के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या करना है। आध्यात्मिक जगत का संपूर्ण ज्ञान इसी के अंतर्गत आता है।

ज्ञान के विशेष प्रकार अथवा ज्ञान प्राप्ति के स्रोत

#1 इंद्रियां अनुभव

हमारे ज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत इंद्रियां अनुभव है। ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं वह इंद्रियां अनुभव कहलाता है। जिस ज्ञान प्राप्ति के लिए अधिक से अधिक इंद्रियों का प्रयोग होता है वह ज्ञान स्थाई होता है।

#2 तर्क

तर्क ज्ञान का स्त्रोत है। तर्क बुद्धि की ओर संकेत करता है। बुद्धि प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य अपना कोई मत बनाता है या किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए दो विधियों का प्रयोग तर्क के अंतर्गत किया जाता है। आगमन और निगमन विधि। आगमन विधि में उदाहरण पहले दिया जाता है तत्पश्चात नियम बताए जाते हैं, जबकि निगमन विधि में पहले नियम बताए जाते हैं और उदाहरण बाद में दिया जाता है।

जैसे लकड़ी का एक टुकड़ा पानी में गिराया जाता है उसके बाद हम देखते हैं कि पानी पर तैर जाता है, बार-बार यह निष्कर्ष यही निकलता है। इससे साबित हो जाता है कि लकड़ी पानी पर तैरती है। उपरोक्त उदाहरण में आगमन विधि का प्रयोग किया गया है। आगमन विधि को निगमन विधि से श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसमें उदाहरण के माध्यम से शिक्षण कार्य कराया जाता है। 

#3 आप्तवचन

ज्ञान का स्रोत ना तो बुद्धि है ना ही इंद्रियां अनुभव। यदि हम अपने दिमाग पर जोर डाले तो हमें ज्ञात होगा कि हमारे आसपास ऐसा अनेक प्रकार का ज्ञान है जो कि हमें ना तो इंद्रियों से प्राप्त होता है ना ही हमारी बुद्धि से। इतिहास की पुस्तक में अनेक तथ्य दृष्टिगोचर होते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार है - गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत का प्रतिपादन न्यूटन ने किया था। उपरोक्त कथनों में तत्कालीन समय का ज्ञान प्रदान करते हैं, लेकिन क्या हम इन कदमों को सत्य मान सकते हैं। हां, हम इनको सत्य मान सकते हैं क्योंकि इन कथनो का प्रतिपादन विशेषज्ञ व विद्वानों के द्वारा हो चुका है। उनके वचनों को ही हम सत्य मानकर ज्ञान के रूप में ग्रहण करते हैं।

#4 अन्तः प्रज्ञा

अन्तः प्रज्ञा ज्ञान का एक विशेष स्रोत होता है जो कि सभी मनुष्यों के पास नहीं होता है। यह हमारे मन की आवाज होती है तथा इंद्रियों से परे एक विशेष प्रकार का अनुभव होता है। जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में छठी इंद्री से जोड़ देते हैं। इस प्रकार के ज्ञान में किसी व्यक्ति विशेष को कुछ घटना घटने से पहले उसका अनुभव हो जाता है। इससे ज्ञाता और ज्ञे दोनों एक ही होता है।

#5 प्रयोगात्मक

इस प्रकार का ज्ञान हमें प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त होता है। इस प्रकार की ज्ञान की पुष्टि अन्य व्यक्तियों द्वारा पुणे प्रयोग करके की जा सकती है। प्रयोग के पश्चात निष्कर्ष निकाला जाता है। इस प्रकार के ज्ञान अधिकतर हमें प्रयोगशाला में प्राप्त होता है।

#6 श्रुति

श्रुति का संबंध धार्मिक ज्ञान से होता है। लगभग सभी देशों में धार्मिक ग्रंथ श्रुति का स्रोत होते हैं। इस प्रकार के ज्ञान को आध्यात्मिक शक्तियों से जोड़ा गया है। यह ज्ञान पूर्णतः आस्था के साथ स्वीकार किया जाता है। यह देश, सीमा और काल में बंधा हुआ नहीं होता। इस प्रकार की ज्ञान में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

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