सामान्यतः हम विभिन्न प्राणियों में मनुष्य की श्रेष्ठता को देखकर कहा करते हैं कि मनुष्य एक बुद्धिमान प्राणी है। यदि यह कहा जाए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि मनुष्य में ही बोलने की शक्ति होती है। जिसके द्वारा वह अपनी बुद्धि की अभिव्यक्ति कर दूसरे लोगों से संपर्क स्थापित करने का अवसर प्राप्त करता है। मनुष्य ने आज संस्कृति तथा सभ्यता को विकसित किया है वह बहुत कुछ भाषा की शुद्धता पर आधारित है।
शिक्षा का एक प्रधान उद्देश्य बालक की भाषा का समुचित ज्ञान करना है। किसी भी व्यक्ति की बौद्धिक योग्यताओं का सर्वश्रेष्ठ माप उसका शब्द भंडार है। कहने का अभिप्राय यह है कि मानव जीवन में भाषा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
भाषा विकास का महत्व
- सामाजिक संबंधों में सहायक
- लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने में सहायक
- मानव विकास में सहायक
- नेतृत्व के विकास में सहायक
- शैक्षणिक उपलब्धि में सहायक
भाषा विकास की अवस्थाएं
भाषा विकास की कुल 5 अवस्थाएं होती है।
#1 बोलने की तैयारी
बोलने की तैयारी की अवस्था भाषा विकास की प्रथम अवस्था है। यह अवस्था 13 - 14 महीने की अवस्था होती है। इसमें बालक रोने, बलबलाने, अंग विक्षेप आदि क्रियाएं करता है। जिन्हें संक्षिप्त में अग्र प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।
#1 चिल्लाना अथवा कृन्दन
जब शिशु का जन्म होता है तो वह खूब चीखता चिल्लाता है। आगे चलकर यही क्रिया जारी रहती है यह क्रिया ही शिशु के भाषा सीखने का सबसे पहला कदम है। जब शिशु के रक्त में वायुमंडल से ऑक्सीजन प्राप्त होती है तो उसके फेफड़े गति करते हैं जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। शरीर के विभिन्न अवस्थाओं जैसे भूख, वेदना आदि की अवस्थाएं, विभिन्न प्रकार के अवरोधों और गले की स्थितियों के कारण इस ध्वनि में अनेक विशेषताएं आ जाती है। प्रथम सप्ताह तक शिशु क्रंदन की ध्वनि करता है। इस क्रिया में कई दयनीय परिवर्तन होते हैं। जैसे - शरीर का लाल हो जाना सांस लेने की प्रक्रिया का अनियंत्रित हो जाना आदि।
#2 ध्वनियां अथवा बलबलाना
शिशु रोने के अतिरिक्त अनेक प्रकार की ध्वनियां निकालता है जैसे - माँ, माँ, ना, ना आदि। प्राय माता पिता शिशु के बलबलाने की ध्वनियां का अर्थ निकालने का प्रयास करते हैं। परंतु प्रारंभ में कोई अर्थ नहीं निकाल पाते है। बाद में जब माता-पिता शिशु को विशिष्ट प्रकार की ध्वनियां निकालने को प्रोत्साहित करते हैं तो इन ध्वनियां का अर्थ निकालने लगते हैं।
#3 अंग विक्षेप
बोलने की तैयारी की अवस्था में तीसरी प्रधान क्रिया अंग विक्षेप है। इसमें बालक अपने संपूर्ण शरीर का प्रयोग करता है जैसे - मुस्कुराना, हाथ फैलाना, क्रोध की अवस्था में पैर पटकना आदि। किंतु जैसे बालक भाषा सीख जाता है वैसे वैसे अंग विक्षेप की क्रियाएं कम करने लगता है। वह अपनी आवश्यकताएं बोलकर ही प्रकट कर देता है।
#2 आंकलन शक्ति
आंकलन शक्ति का तात्पर्य बालक की उसकी योग्यता से है जिससे वह दूसरों की क्रियाएं तथा भाव समझ लेता है। इस अवस्था में बालक जितने शब्दों को बोल सकता है उससे अधिक शब्दों को समझ सकता है।
#3 शब्द प्रयोग
जैसे-जैसे बालक की आकलन शक्ति का विकास होता है वैसे-वैसे उसका शब्द भंडार बढ़ता जाता है। प्रारंभ में वह सुने हुए शब्दों को दोहराने का प्रयास करता है फिर उनको बोलना सीखता है। कई परीक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि बालक के शब्द भंडार में सबसे अधिक विकास स्कूल जाने पर होता है।
#4 वाक्य प्रयोग
सर्वप्रथम बालक प्राय डेढ़ वर्ष का होता है तो वह 2 शब्दों के वाक्य को बोलना प्रारंभ करता है। जैसे - बिल्ली आई, रोटी खाना आदि। 3 वर्ष का होते होते बालक कुछ बड़े वाक्यों का प्रयोग करने लगता है, 4 वर्ष की आयु में बालक पूर्ण वाक्य का प्रयोग करता है और वह जब स्कूल जाता है तो भाषा का पर्याप्त विकास कर लेता है।
#5 शुद्ध उच्चारण
भाषा विकास की अंतिम अवस्था में बालक द्वारा शब्दों और वाक्यों का अशुद्ध उच्चारण होने लगता है। 18 महीने की आयु तक बालक की बोली को समझना कठिन होता है। परंतु 3 वर्ष की आयु तक उसकी भाषा में पर्याप्त सुधार हो जाता है। वह शब्दों का सही उच्चारण करने लगता है।
भाषा विकास की प्रक्रिया
#1 अनुकरण द्वारा सीखना
सर्वप्रथम शिशु को मां की बोली का अनुकरण करने का अवसर प्राप्त होता है। प्रारंभ में बालक मां की बोली को बिना सोचे समझे उसका अनुकरण करता है, किंतु बाद में उसे अनुकरण में आनंद आने लगता है। वह अनेक ध्वनियों का उच्चारण करने लगता है। इसके संबंध में स्ट्रेचर का मत है कि बालक अनुकरण द्वारा सीखता है अतः उसे उच्चारण से संबंधित प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
#2 प्रयास व भूल द्वारा सीखना
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डैशियल ने कहा है कि पहले यह बताया जाता था कि बालक केवल सुने हुए शब्दों का अनुकरण करता है किंतु अनुकरण का सिद्धांत मान्य नहीं है। यदि शिशु अनुकरण मात्र के आधार पर दोनों शब्दों को ग्रहण करता तो बालक शीघ्र बोलना सीख जाता। डैशियल के अनुसार बालक अनुकरण से नहीं बल्कि प्रयास तथा भूल के सिद्धांत की योग्यता से सीखता है।
#3 संबद्धता
बालक भाषा सीखने के पूर्व कुछ स्वभाविक ध्वनियाँ मुँह से निकालता है जो निरर्थक होती है। उदाहरण के बालक जो निरर्थक ध्वनिया निकालता है उनमें से एक पी शब्द है। बालक बार-बार इस ध्वनि को निकालता है तब मां इस ध्वनी को और अधिक प्रोत्साहित करती है।
इसके बाद मां एक पिल्ले को बालक के सामने लाती है और पिल्ला शब्द का उच्चारण करती है। यही क्रिया कई दिन तक करने के बाद जब बालक के सामने पिल्ला आता है तो उसे देखकर बालक पी पी शब्द का उच्चारण करता है। इस प्रकार बालक के निरर्थक ध्वनियों को किसी वस्तु प्राणी या व्यक्ति से संबद्धता स्थापित कर उसे अनेक सार्थक शब्द बोलना सिखाया जाता है।
#4 प्रेरणा
प्रारंभ में बालक क्रंदन अंग विक्षेप एवं बलबलाने आदि की क्रियाएं करता है। माता-पिता इन क्रियाओं को समझकर ही उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करते हैं और जो माता पिता बालक की आवश्यकताओं को नहीं समझ पाते वे अपने बालक की सभी आवश्यकताएं ठीक से पूरी नहीं कर पाते। बालक जैसे-जैसे बड़ा होता है और उसे अपनी आवश्यकताओं को समझता है तो इसके लिए वह बोलना कि आवश्यक अनुभव करता है।
भाषा दोष तथा भाषा दोष दूर करने के उपाय
अस्पष्ट बोलना, ध्वनि परिवर्तन, अक्षर लोप, हकलाना आदि भाषा दोष है। इसे दूर करने के उपाय निम्न है।
- जिन बालकों में भाषा दोष हो उनका उपहास नहीं उड़ाना चाहिए।
- बालकों को प्रारंभ से ही सही उच्चारण सिखाना चाहिए।
- बालकों की तोतली भाषा सबको अच्छी लगती है किन्तु माता-पिता को चाहिए कि वह बालक की इस प्रवृत्ति को बढ़ावा ना दें।
- बालकों को अपनी उम्र के बालकों के साथ उठने बैठने और खेलने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए जिससे वह अपनी भाषा के दोस्त से अवगत हो सके तथा उनमें सुधार हो सके।
भाषा विकास को प्रभावित करने वाले तत्व या कारक
- शारीरिक रचना
- शारीरिक स्वास्थ्य
- लिंग भेद
- बौद्धिक स्तर
- परिवार का सामाजिक और आर्थिक स्तर
- संवेगात्मक तनाव
- पारिवारिक संबंध

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