पाठ्यक्रम का अर्थ केवल उन सैद्धांतिक पाठ्य विषयों से नहीं है जो विद्यालय में परंपरागत ढंग से पढ़ाई जाते हैं वरन इसमें अनुभवों की संपूर्णता निहित है जिसको छात्र विद्यालय कक्षा कक्ष, पुस्तकालय, वर्कशॉप, प्रयोगशाला और खेल के मैदान तथा शिक्षकों एवं शिक्षकों के अगणित अनौपचारिक संपर्कों से प्राप्त करता है। इस प्रकार विद्यालय का संपूर्ण जीवन पाठ्यक्रम हो जाता है जो छात्र के जीवन में सभी पक्षों को प्रभावित कर सकता है और उनके संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता देता है।
अतः हम कह सकते हैं कि वर्तमान संदर्भ तथा शिक्षा के क्षेत्र में हुए अनुसंधानो के कारण पाठ्यक्रम का अर्थ विस्तृत एवं व्यापक हो गया है। वर्तमान पाठ्यक्रम के व्यापक अर्थ में संपूर्ण शैक्षिक वातावरण विषय एवं शिक्षण को सम्मिलित किया जाता है जबकि प्राचीन समय में पाठ्यक्रम का अर्थ केवल विद्यालय में पढ़ाए जाने वाले विषयों से ही लिया जाता था।
अतः हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम एक ऐसा साधन या मार्ग है जिसका अनुसरण करके अध्यापक और छात्र दोनों मिलकर शिक्षा के उद्देश्यों रूपी मंजिल को तय करते हैं। पाठ्यक्रम निर्माण के कई महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो कि निम्न प्रकार है।
पाठ्यक्रम निर्माण में सहायक प्रमुख सिद्धांत
#1 लक्ष्य या उद्देश्य प्राप्ति का सिद्धांत
शिक्षण एक उद्देश्य प्रक्रिया है, अतः सभी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है। जिस प्रकार वे उदेश्य होंगे पाठ्यक्रम भी वैसा ही होगा। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी में सामाजिकता के गुणों को विकसित करना, लोकतांत्रिक नागरिकता का विकास करना, विषय वस्तु के विषय में पूर्ण जानकारी प्रदान करना, छात्र का सर्वांगीण विकास करना, आदि पाठ्यक्रमों के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।
#2 समाज केंद्रित सिद्धांत
पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य जन्म से ही सामाजिक प्राणी है। वह समाज के बिना अपना विकास और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता था, इस सिद्धांत के अनुसार पाठ्यक्रम में उन विषय वस्तु को सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिससे कि बालक में सामाजिकता के गुण का विकास किया जा सके एवं बालक सामाजिक मूल्यों अनुशासन, संस्कृति, सामाजिक परंपराएं आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त कर सके।
#3 प्रेरणा का सिद्धांत
प्रेरणा शब्द से अभिप्राय है बालकों को सिखाने के लिए प्रेरित करना, प्रोत्साहित करना इस सिद्धांत के अनुसार पाठ्यक्रम में इस प्रकार की विषय वस्तु को समाहित किया जाना चाहिए। जो कि बालकों के मन में प्रेरणा उत्पन्न कर सके, शिक्षा के लिए प्रेरित करना, जिज्ञासा उत्पन्न करना, विषय वस्तु के बारे में ज्ञान प्राप्त करना आदि।
#4 रूचि का सिद्धांत
पाठ्यक्रम के अंतर्गत रूचि के सिद्धांत की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सिद्धांत के अनुसार विषय वस्तु का चयन करते समय बालकों की रुचि, योग्यता क्षमताएं, आवश्यकता को ध्यान में रखना चाहिए। तभी बालक शिक्षण में रुचि लेंगे, अन्यथा अध्यापक के डर से शांति से बैठेंगे, परंतु निष्क्रिय सोता मात्र बनकर रहेंगे
#5 एकीकरण का सिद्धांत
एकीकरण का अर्थ है सम्मिलित करना आधार पाठ्यक्रम का यह सिद्धांत कहता है कि छात्र के सामने जो विषय वस्तु प्रस्तुत की जाए, उसका संबंध किसी एक विशेष है ना होकर अन्य सभी विषयों के साथ होना चाहिए। जिससे कि उस विषय वस्तु के संपूर्ण जानकारी छात्र को दी जा सके।
#6 लचीलापन का सिद्धांत
पाठ्यक्रम का जब निर्माण किया जाता है तब सामान्यतः तो उसमें कुछ ना कुछ कमी रह जाती है और उन कमियों को दूर करने के लिए समय के साथ-साथ पाठ्यक्रम में परिवर्तन होना चाहिए। वर्तमान समाज विकास की प्रक्रिया की ओर अग्रसर है और समाज की आवश्यकताओं में पुरातन काल से लेकर वर्तमान तक परिवर्तन होता रहा है। इन्हीं परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में भी बदलाव होता रहना चाहिए।
#7 शिक्षा में व्यापकता का सिद्धांत
आमतौर पर यह देखा गया है कि लोगों के मन में यह धारणा होती है कि जो कुछ पुस्तकों में है वही पाठ्यक्रम में परंतु यह धारणा संकुचित है, जबकि पाठ्यक्रम का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत विद्यार्थी के और विद्यालय के संपूर्ण क्रियाकलापों को सम्मिलित किया जाता है। व्यापकता का सिद्धांत यह कहता है की विषय वस्तु का जब चयन किया जाए तो विषय वस्तु को रोचक बनाने के लिए उदाहरण, मुहावरे, दृष्टांत प्रयोग आदि को सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिससे कि छात्र विषय वस्तु को सरलता से ग्रहण कर सकें।
#8 चयन का सिद्धांत
पाठ्यक्रम निर्माण में चयन के सिद्धांत की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सिद्धांत के अनुसार विषय वस्तु का चयन सरल से कठिन की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर, सामान्य से विशिष्ट की ओर, आदि शिक्षण सूत्रों के आधार पर किया जाना चाहिए। तात्पर्य यह है कि प्रारंभिक विषय वस्तु का चयन छात्रों के पूर्व ज्ञान से संबंधित होना चाहिए। इसमें छात्रों की रुचि मानसिक योग्यता तथा आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
#9 अवकाश के सदुपयोग का सिद्धांत
अच्छा पाठ्यक्रम वह माना जाता है जिसमें पाठ्यपुस्तक के साथ-साथ पाठ्य सहगामी क्रियाओं को भी सम्मिलित करता हो। सामान्यत छात्र अवकाश का उपयोग मौज-मस्ती और मनोरंजन में करते हैं। इस दौरान यदि अवकाश लंबे समय का हो जाए तो छात्र शिक्षा से दूर हो जाता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए पाठ्यक्रम में प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिससे कि छात्र अवकाश के समय भी शिक्षा से जुड़ा हुआ रहेगा।
#10 उपयोगिता का सिद्धांत
पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए कि उसका सीधा संबंध छात्र के जीवन से हो, क्योंकि जब छात्र स्कूल छोड़ देगा तब वह सांसारिक जीवन में प्रवेश प्रवेश करेगा। अतः भविष्य में वह शिक्षा उसके जीवन में उपयोगी सिद्ध होनी चाहिए, तभी पाठ्यक्रम अपने आप में सफल माना जाएगा।
#11 व्यापक आधार का सिद्धांत
पाठ्यक्रम का जब चयन किया जाए तब उसका आधार विस्तृत होना चाहिए। अतः चयन करते समय प्रत्येक पहलू को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। जैसे - छात्र की रूचि, छात्र की मानसिक क्षमता, समाज की आवश्यकता, सामाजिक मूल्य, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति आदि।

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