परिवर्तन प्रक्रिया में पाठ्यसामग्री चयन के आधार

#1 ज्ञात से अज्ञात की ओर

इस शिक्षण सूत्र में सर्वप्रथम शिक्षण बालकों को ज्ञात विषय पढ़ाएगा। इस से छात्रों का पूर्व ज्ञान ज्ञात किया जाता है। अतः कक्षा कक्ष में शिक्षण कार्य कराने से पूर्व छात्रों के पूर्व ज्ञान को जानने के लिए अध्यापक कुछ प्रश्न पूछता है और यदि छात्र प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम होते हैं वो शिक्षक उनके पूर्व ध्यान से अपने नवीन ज्ञान को संयोजित करता है।

इस प्रक्रिया में छात्र शिक्षण कार्य से स्वभाविक रुप से जुड़ जाता है और उसमें आत्मविश्वास की भावना विकसित हो जाती है। इससे शिक्षक का शिक्षण कार्य रुचिकर व प्रभाव पूर्ण बन जाता है। इस प्रकार से छात्र सरलता से विषय वस्तु को ग्रहण कर लेते हैं और शिक्षक का भी शिक्षण कार्य सफल माना जाता है।

#2 सरल से कठिन की ओर

विद्यार्थी को पहले सरल पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, जिससे उसके अंदर संतोष होगा और आत्मविश्वास की भावना विकसित होगी। इसके बाद में बालक को धीरे-धीरे कठिनता के स्तर की ओर अग्रसर किया जाना चाहिए। सामान्यतः जब शिक्षण कार्य सरल से कठिनता कि ओर किया जाता है तो बालक की शिक्षण में रुचि उत्पन्न हो जाती है। वह कठिन विषय वस्तु को भी सरलता के साथ ग्रहण कर लेता है।

जैसे - हम बालक को पदम सरोवर प्रकरण के बारे में शिक्षण कार्य कराएंगे, किंतु छात्र जब तक पदम और सरोवर का अर्थ नहीं समझेगा, तब तक वह उलझन में पड़ा रहेगा कि पदम होता क्या है।

अतः हमें सर्वप्रथम पदम और सरोवर का अर्थ स्पष्ट करना होगा। तब कहीं जाकर छात्र विषय वस्तु को ग्रहण करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो पाएगा। अंग्रेजी विषय पढ़ाने के लिए हम छात्रों को सर्वप्रथम एबीसीडी का ज्ञान देते हैं और उसके बाद ही अर्थ सिखाए जाते हैं। अतः शिक्षण कार्य का प्रस्तुतीकरण सरल से कठिन की ओर होना आवश्यक है, तभी शिक्षण कार्य सफल माना जाएगा।

#3 संपूर्णता से अंश की ओर

शिक्षण सूत्र में छात्र को विभिन्न संपूर्ण विषय वस्तु से अवगत कराया जाता है। तत्पश्चात विभिन्न भागों या अंशों का ज्ञान दिया जाता है। बालक की प्रारंभिक अवस्था में गैर शिक्षण सूत्र अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। जैसे वृक्ष के विभिन्न भागों का ज्ञान प्रदान करने से पहले छात्रों को संपूर्ण वृक्ष से अवगत कराना चाहिए। इसके लिए वृक्ष का चित्र बनाकर बालकों को दिखाएं और फिर उनका अध्ययन करवाएं।

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बालक को पहले संपूर्णता में ले जाएं, इसके पश्चात ही उससे अंश का ज्ञान दिया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में बहुत से प्रयोग करके शिक्षण सूत्रों का निर्माण किया। इसी प्रकार अन्य विषयों में भी जैसे विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, भूगोल आदि से पहले विषय वस्तु प्रस्तुत की जानी चाहिए, उसके बाद में उसके अवयवों की जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। ऐसा करने से छात्र की निरंतरता और सक्रियता बनी रहती है।

#4 प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर

किसी अप्रत्यक्ष वस्तु की जानकारी यदि छात्र को देनी है तो पहले उस अप्रत्यक्ष वस्तु का प्रत्यक्ष रूप प्रदर्शित करना चाहिए। विद्यालय में उपलब्ध उससे संबंधित वस्तु का ज्ञान बालक को कराना चाहिए, अनुपलब्ध विषय वस्तु ही अप्रत्यक्ष वस्तु होती है जो हमारे सामने उपस्थित नहीं है उसे परोक्ष या अप्रत्यक्ष कहते हैं।

अध्ययन कराते समय कई प्रकरण इस प्रकार के आते हैं जिनके बारे में छात्रों को पूर्वज्ञान नहीं रखता है। अतः विद्यालय के माध्यम से उन्हें स्थानों, वस्तुओं की जानकारी हम बालक को प्रत्यक्ष रूप से ले जाकर कराएं तो विद्यार्थी उस ज्ञान को सरलता से ग्रहण कर लेता है।

जैसे - हमें थार के मरुस्थल का शिक्षण कराना है, मरुस्थल छात्रों के लिए अप्रत्यक्ष है। अतः वे इससे तब तक अवगत नहीं हो पाएंगे, जब तक की उनको मरुस्थल का कोई प्रत्यक्ष प्रारूप नहीं दिखा दिया जाए। अतः हमें छात्रों को पास ही के किसी बालू के टीले पर ले जाएंगे, इससे बालक का अनुमान लगा लेगा कि बालू का टीला रेगिस्तान का एक अंग है और इस प्रकार के अनेक टीले मिलकर रेगिस्तान का निर्माण करते हैं।

इस प्रकार से बालक शिक्षण में रुचि लेगा और विषय वस्तु को सरलता से ग्रहण कर लेगा। इस प्रकार का प्राप्त ज्ञान बालक की मस्तिष्क में स्थाई हो जाएगा।

#5 विशिष्ट से सामान्य की ओर

विशिष्ट से सामान्य की ओर शिक्षण सूत्र में छात्र को विशेष तथ्यों की जानकारी दी जाती है और उसका सामान्यकरण विद्यार्थी स्वयं करता है। सामान्यकरण करने से बालक की बौद्धिक क्षमता का विकास होता है इससे छात्र की तर्क शक्ति और चिंतन शक्ति का विकास होता है।

सामान्यतः शिक्षण सूत्र के अंतर्गत बालकों को उदाहरण के द्वारा समझाया जाता है, तत्पश्चात छात्रों द्वारा उसका नियमीकरण किया जाता है। इस प्रक्रिया में छात्र शिक्षण से पूर्ण रूप से जुड़ जाता है और स्वयं के द्वारा नियमित किए जाने से उसमें आत्मविश्वास जागृत होता है।

#6 स्थूल से सूक्ष्म की ओर

यदि प्रारंभ में बालक को उस वस्तु का दर्शन करा दे, जिस वस्तु से बालक को अधिगम कराना है, तो बालक प्रस्तुत विषय में अच्छी तरह से अधिगम कर पाएगा तथा बालक का दृष्टिकोण स्थिर हो जाएगा। जैसे - गणित के प्रारंभिक ज्ञान के लिए जोड़, बाकी सिखाने के समय हम चार-पांच बॉक्स रख सकते हैं और बॉक्स को क्रमशः एक दूसरे के समीप रखते जाएंगे तथा गिनती करते जाएंगे।

यह प्रक्रिया जब बालक देखेगा तो वह आसानी से समझ जाएगा कि एक और एक दो होते हैं। बालक स्वयं ही अवसर पाकर इस प्रयोग को करेगा। इसी प्रकार घटाते समय वहां से हम एक बॉक्स को उठा लेंगे, इससे बालक समझ जाएगा कि बॉक्स को एक दूसरे के पास रखने पर जोड होता है तथा निकालने से बाकी होता है।

इसके अतिरिक्त बालक को अधिगम शिक्षण सहायक सामग्री से समीप ले जाकर अवगत कराना चाहिए, जिससे बालक में चिंतन व पर्यवेक्षण का गुण विकसित होगा तथा बालक उसको देखकर स्पर्श करके उसकी विशेषताओं के बारे में स्वतः ही पता लगाकर अधिगम कर पाएगा।

#7 अनुभव से तर्क की ओर

यह सबसे विशिष्ट शिक्षण सूत्र है। हम प्रतिदिन देखते हैं कि बालक जैसे-जैसे बड़ा होता है वैसे-वैसे उसको नए नए अनुभव प्राप्त होते हैं और अपने अनुभवों से वह कुछ न कुछ सीखता है। यदि बालक ने दृश्य, श्रव्य अवस्था में किसी प्रकार का अनुभव किया है। वह उसे स्पष्ट करने के बारे में सोचता है, उसके मन में असंख्य सवाल उत्पन्न होते हैं।

वह देखता है कि प्रतिदिन सूर्य पूर्व दिशा से उदय होकर पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है। बालक ऐसा प्रतिदिन देखता है और सोचता है कि ऐसा क्यों होता है। इस प्रकार के विषयों का समाधान करने के लिए तर्क का सहारा लिया जा सकता है। इस प्रकार से छात्र के अनुभव को हम तर्क के द्वारा स्थाई ज्ञान में परिवर्तित कर सकते हैं।

#8 विश्लेषण से संश्लेषण की ओर

यह एक महत्वपूर्ण शिक्षण सूत्र है। जो कि शिक्षण कार्य को विस्तृत रूप से प्रदर्शित करता है इसके अंतर्गत प्रकरण से संबंधित प्रत्येक पहलू को छात्र के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। उसके पश्चात हम संश्लेषण की ओर अग्रसर होते हुए मुख्य प्रकरण पर आ जाते हैं। इसके माध्यम से बालक विषय वस्तु से सरलता के साथ संयोजित हो जाता है तथा बालक के मन में उठने वाले सवाल भी स्वत: ही शांत हो जाते हैं।

#9 वास्तविकता से प्रतिरूप की ओर

एक उत्तम शिक्षण कार्य वही माना जाता है जो छात्र को संतुष्ट करने की क्षमता रखता हो। सामान्यता शिक्षक कक्षा में बालकों को विषय वस्तु से संबंधित व्याख्यान देकर चला जाता है, किंतु कक्षा में कई तरह के बालक होते हैं और पिछड़े हुए बालक ऐसी स्थिति में और पिछड़ते चले जाते हैं।

अतः शिक्षण सूत्र के अनुसार प्रकरण से संबंधित प्रतिरूप को कक्षा में प्रदर्शित करवा कर शिक्षण कार्य किया जाना चाहिए। इससे बालक के मानस पटल पर अनदेखी विषय वस्तु की एक छवि अंकित हो जाती है और बालक सरलता के साथ विषय वस्तु को ग्रहण कर लेता है।

0/Post a Comment/Comments