बालको के मानसिक विकास पर कई मनोवैज्ञानिकों ने कार्य किया और उनके द्वारा प्रतिपादित किये गए सिद्धांतो को संज्ञानात्मक सिद्धांत कहा जाता है।जैसे - जीन पियाजे का संज्ञानात्मक सिद्धांत तथा जेरोन ब्रुनेर का संज्ञानात्मक सिद्धांत।
जीन पियाजे का संज्ञानात्मक सिद्धांत
जीन पियाजे स्विजरलैंड मनोवैज्ञानिक थे, जो मूलतः जीव-जंतु शास्त्री थे। इन्होंने अपने पुत्रो पर तथा आसपास के बच्चों के व्यव्हार का अध्ययन किया और देखा कि किस प्रकार से बच्चों का मानसिक विकास होता है। जीन पियाजे ने 80 से भी अधिक पत्र - पत्रिकाएं लिखी और इन्होंने अपने संज्ञानात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन अपनी पुस्तक "संज्ञानात्मक विकास कब और क्यों" में प्रतिपादन किया।
संज्ञानात्मक विकास की कार्य विधि
जीन पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक सिद्धांत में मानसिक विकास की कुल 4 अवस्थाएं बताई।
#1 संवेगात्मक गामक अवस्था
यह अवस्था जीरो से 2 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में बालक संवेदनाओ के द्वारा सीखता है जैसे - बिल्ली को देखकर डर जाना। शरीर के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को गामक क्रिया कहा जाता है। गामक क्रिया में मस्तिष्क या बुद्धि की कोई भूमिका नहीं होती है। इस अवस्था में सीखने का आधार गामक क्रिया होती है जैसे - पकड़ना, चलना, बोलना, बनाना, चूसना आदि। इस अवस्था में बालक संवेदनात्मक और गामक क्रिया करता है जो अनुवांशिकता और वातावरण होने पर दोनों पर आधारित होती है। पियाजे के अनुसार इस प्रकार की क्रियाएं उसके मस्तिष्क से जुड़ी हुई होती है। जिसे स्कीमा कहा जाता है। इस अवस्था में बालक अनुकरण करने लगता है और ध्वनि और प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करता है।
#2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था
2 से 7 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में शिशु अपने परिवार के दायरे से बाहर निकलता है और अन्य बालकों के साथ खेल खेलने लगता है। इसे जीन पियाजे ने द वर्क ऑफ चाइल्ड की संज्ञा दी।
( a ) पूर्व सम्प्रत्यात्मक अवस्था
2 से 4 वर्ष तक होती है। बालक प्रतीकों, शब्दों, खेलों, वाक्यों आदि का प्रयोग करना आरंभ कर देता है। इस अवस्था में वह प्रतीकात्मक खेल खेलने लगता है। इस अवस्था में सजीवता के लक्षण पाए जाते हैं। जैसे - यह गुड़िया नहीं मेरी सहेली है, मेरा चंदा मामा घर जा रहा है, मैं तो मेरी सहेली को साथ लेकर सोऊंगी। इस अवस्था में बालक सही अनुपात का अंतर नहीं कर पाते हैं। इस अवस्था में बालक वैसा चित्र नहीं बना पाते जैसा उनको बनाने के लिए कहा जाता है।
( b ) अंतर प्रज्ञा काल
यह 4 से 7 वर्ष तक होती है। इस काल में पूर्व संप्रत्यात्मक अवस्था की सभी अवधारणाएं समाप्त हो जाती है। इस अवस्था में विलोमता के गुण पाए जाते हैं। इस अवस्था में बालक अतार्किक चिंतन करने लग जाता है।
#3 संक्रियात्मक अवस्था
7 से 12 वर्ष तक होती है। इसे मूर्त संक्रियात्मक अवस्था भी कहा जाता है। इस अवस्था में विलोम उत्क्रमणीयता के गुण समाप्त हो जाते हैं। इस अवस्था में आगमन चिंतन विकसित होने लगता है। बड़े और छोटे में अंतर करना सीख लेता है। आरोही व अवरोही क्रम को समझने लगता है। इस अवस्था में अतार्किक चिंतन और तार्किक चिंतन का स्थान ले लेता है अतः तार्किक चिंतन करने लगता है।
#4 औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था
11 से 15 वर्ष तक। समस्या समाधान की प्रणाली का निकाय। अमूर्त चिंतन, उच्च स्तरीय मानसिक योग्यताओं का विकास, सिद्धांतों/ नियमों/ सूत्रों, संपत्तियों आदि की अवधारणाएं विकसित होती है। इस अवस्था में निष्कर्ष कल्पना चिंतन मनन बुद्धि सर्जनशीलता आदि का समावेश होता है
जेरोम ब्रूनर का संज्ञानात्मक सिद्धांत
जेरोम ब्रूनर ने अपने संज्ञानात्मक सिद्धांत में शिक्षा और वातावरण को बहुत महत्व दिया। जेरोम ब्रूनर ने मानसिक विकास की तीन अवस्थाएं बताई है - पहली अवस्था 0 से 2 वर्ष तक क्रिया आधारित अवस्था विधि निर्माण की अवस्था होती है, दूसरी अवस्था प्रतिमा आधारित अवस्था या प्रतिबिम्बात्मक अवस्था होती है जो कि 2 से 7 वर्ष तक होती है, तीसरी संकेत आधारित या चिन्हित आधारित अवस्था जो कि 7 से 16 वर्ष की आयु तक होती है।
#1 क्रिया आधारित अवस्था / विधि निर्माण की अवस्था
इस अवस्था में बालक शारीरिक गामक क्रियाओ के द्वारा सीखते हैं। हाथ-पैर चलाना, चीजों को पकड़ना, वातावरण के साथ प्रतिक्रिया करना आदि, इस अवस्था में बालक का कोई महत्व नहीं होता है। भाषा का कोई महत्व नहीं होता है, इस अवस्था में बालक प्रतीकों, प्रतिक्रियाओं, प्रतिबिंब, संप्रत्यय द्वारा नहीं सीख पाता है। इस अवस्था में बालक दूसरों का अनुकरण करते हैं।
#2 प्रतिमा आधारित अवस्था या प्रतिबिंबात्मक अवस्था
इस अवस्था में जीतने का आधार प्रतियां, प्रतीक, प्रतिबिंब होते हैं। इस अवस्था में भाषा का महत्व होता है। इस अवस्था में गति, ध्वनि, प्रकाश से बालक प्रभावित होते हैं। इस अवस्था में बालकों में दृश्य स्मृति विकसित हो जाती है।
#3 संकेत आधारित अवस्था या चिन्ह अधारित अवस्था
7 से 15 वर्ष की आयु तक। इस अवस्था में सीखने का आधार संकेत चिन्ह होते हैं। इस अवस्था में समस्या समाधान की क्षमता उच्च स्तर की होती है।

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