वर्तमान समय में शिक्षा जगत में पाठ्यक्रम के लिए curriculam के साथ-साथ syllabus शब्द का भी प्रयोग होता है, परंतु गहनता से देखें तो इन दोनों शब्दों में व्यापक अंतर नजर आता है। पाठ्यक्रम शब्द का उपयोग व्यापक अर्थ में होता है क्योंकि पाठ्यक्रम के अंतर्गत वे सभी अनुभव आ जाते हैं जिन्हें छात्र विद्यालय जीवन में प्राप्त करता है और इनके अंतर्गत कक्षा के अंदर एवं बाहर आयोजित होने वाली शैक्षणिक एवं पाठ्य सहगामी क्रियाएं सम्मिलित होती हैं।
पाठ्यवस्तु पूर्ण शैक्षिक सत्र में विभिन्न विषयों में शिक्षण द्वारा इन छात्रों को दिए जाने वाले ज्ञान की मात्रा के विषय में जानकारी प्रस्तुत करता है। शिक्षा शब्दकोश में सिलेबस के विषय में लिखा है की पाठ्यवस्तु अध्ययन की विषय वस्तु के मुख्य बिंदुओं का कथन या संक्षिप्त रूपरेखा है। शिक्षण में अध्यापक एवं विद्यार्थियों की सुविधा के लिए विषय सामग्री को व्यवस्थित रूप से एकत्रित कर लिया जाता है तो उसे हम पाठ्यवस्तु कहते हैं। पाठ्यक्रम शब्द का प्रयोग कभी-कभी भ्रमवश सिलेबस के अर्थ में कर दिया जाता है परंतु पाठ्यवस्तु तो केवल पाठ्यक्रम का एक अंग मात्र है ना कि संपूर्ण पाठ्यक्रम।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि पाठ्यक्रम कक्षा में तथा कक्षा के बाहर प्राप्त अनुभव है, जिसमें सभी बौद्धिक विषय, विभिन्न कौशल, पढ़ना, लिखना, खेलकूद एवं अन्य पाठ्य सहगामी क्रियाएं आदि सम्मिलित हैं। पाठ्यक्रम में कक्षा, पुस्तकालय, खेल का मैदान, प्रयोगशाला, समस्त विद्यालय प्रांगण, शैक्षणिक कार्य आदि द्वारा सभी अनुभव को सम्मिलित किया जाता है।
पाठ्यक्रम शिक्षा एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है। शिक्षा को त्रिध्रुवीय प्रक्रिया माना गया है। जिसके तीन ध्रुव क्रमशः शिक्षक, पाठ्यक्रम एवं विद्यार्थी है। पाठ्यक्रम को शिक्षक तथा विद्यार्थी के मध्य की कड़ी माना गया है।
पाठ्यक्रम का अर्थ
curriculam शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द क्यूर से हुई है जिसका अर्थ होता है "दौड़ का मैदान"। विभिन्न विद्वानों ने पाठ्यक्रम के संबंध में अपने अपने मत प्रस्तुत किए हैं जो कि इस प्रकार से हैं।
- क्रो एंड क्रो के अनुसार "पाठ्यक्रम विद्यार्थी के उन समस्त अनुभवों से संबंधित है जो उसे विद्यालय में और उसके बाहर प्राप्त होते हैं जो उसके मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक तथा नैतिक विकास में सहायक हैं"।
- कनिंघम के अनुसार "पाठ्यक्रम कलाकार के हाथ में एक मैं एक साधन है जिससे वह अपनी सामग्री को अपने आदर्श के अनुसार अपने स्टूडियो में ढालता है"।
- मुदालियर कमीशन के अनुसार "पाठ्यक्रम विभिन्न अनुभवों का योग है"।
- रुडयार्ड व हेनरी के अनुसार "अपने व्यापक अर्थ में पाठ्यक्रम के अंतर्गत संपूर्ण विद्यालय वातावरण आता है, जिसमें सभी प्रकार के कोर्स, क्रियाएं, पढ़ना तथा सहचार्य सम्मिलित हैं जो छात्रों को विद्यालय में प्राप्त होते हैं"।
- मुनरो के अनुसार "पाठ्यक्रम में वे समस्त अनुभव निहित है जिनको विद्यालय द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है"।
- ऐनन के अनुसार "पाठ्यक्रम पर्यावरण में होने वाली क्रियाओं का योग है"।
ज्ञान प्राप्त करने के स्रोत के रूप में विद्यालयों का महत्व
#1 व्यक्तित्व का विकास
विद्यालय में बालक का विकास परिपूर्ण संभव है। विद्यालय के अंदर सामान्य बालक अपने शिक्षकों का अनुसरण करता है, अतः वह अपने व्यक्तित्व में उन सभी गुणों का समावेश करता है जो उसके आदर्श शिक्षक के व्यक्तित्व में निहित है। इसके अलावा कक्षा में अन्य छात्र प्रतिभाशाली छात्र की तरफ आकर्षित होता है और उन्हीं से मिलना पसंद करता है। इससे छात्रों में व्यक्तित्व के गुणों का आदान-प्रदान होता है।
#2 सांस्कृतिक चेतना का विकास
विद्यालय का वातावरण वहां की संस्कृति से प्रभावित होता है। विद्यालय में अनेक जाति, धर्म, भाषा आदि से संबंधित छात्र आते हैं। अतः विद्यालय में सभी धर्मों संस्कृतियों आदि को उद्धार भाव से देखने का गुण विकसित किया जाता है तथा छात्रों को सभी धर्मों के प्रति आदर करने को प्रेरित किया जाता है।
#3 आदर्श समाज का निर्माण
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री एवं शिक्षाविद जॉन डीवी ने कहा है कि बिना समाज के मनुष्य का अस्तित्व नहीं है। अतः विद्यालय के द्वारा बालकों में सामाजिकता का गुण का विकास किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि विद्यालय एक सभ्य समाज के लिए उचित एवं योग्य नागरिक तैयार करने का कार्य करता है तथा देश का सामान यदि सभ्य और शिक्षित होगा तभी देश का विकास संभव है।
#4 मानवीय गुणों का विकास
विद्यालय के द्वारा छात्र में मानवीय गुणों का विकास किया जाता है। छात्र में विभिन्न धर्मों, जातियों, धार्मिक ग्रंथों एवं रीति रिवाज आदि के प्रति उदार दृष्टिकोण विकसित किया जाता है। अतः विद्यालय के माध्यम से ही इन गुणों का विकास संभव है।
#5 विशिष्ट वातावरण
छात्र अपने घर पर ठीक प्रकार से अध्ययन नहीं कर पाता, क्योंकि विषय वस्तु से संबंधित अनेक प्रकार की समस्याएं उसके सामने आती है तथा घर का वातावरण शिक्षा के लिए उपयुक्त ना हो तो शेष छात्र विषय वस्तु को ग्रहण नहीं कर पाता आता। इन समस्याओं से छुटकारा दिलाने दिलाने के लिए छात्र विद्यालय का वातावरण ही शिक्षा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त माना जाता है तथा विद्यालय में अनेक प्रकार की मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा शिक्षण कार्य कराया जाता है अतः विद्यालय में छात्रों को ज्ञान अर्जित करने के लिए पूर्ण वातावरण उपलब्ध हो जाता है।
#6 जटिल समस्या का समाधान
विद्यालय में बालक ज्ञान अनुभव तथा सहयोग के आधार पर जीवन के अनेक समस्याओं से अवगत होता है तथा उन को समझाने का प्रयत्न करता है तथा निरंतर प्रयास से वह अपनी समस्याओं का समाधान करना सीख जाता है।
#7 नागरिकता हेतु शिक्षा
विद्यालय समाज का छोटा रूप है समाज अपने कुछ कानून, नियम, सामाजिक मूल्य एवं सीमाएं निश्चित करता है। क्योंकि मनुष्य जन्म से ही सामाजिक प्राणी है तथा बिना समाज के उसका कोई अस्तित्व नहीं है। विद्यालय द्वारा छात्र में सामाजिकीकरण का गुण विकसित किया जाता है। विद्यालय के नियम एवं अनुशासन का पालन न करना छात्र सीख जाता है। इस प्रकार व समाज के नियमों को भी मानने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है।
#8 संस्कृति का विकास एवं स्थानांतरण
संस्कृति के अंतर्गत हम कहीं तत्वों को रख सकते हैं जैसे हमारे रीति रिवाज, परंपराएं, सामाजिक मान्यताएं, हमारा रहन-सहन, चाल-चलन आदि। अतः समाज में हम किस प्रकार रहना है, किस प्रकार का व्यवहार करना है, यह सब हमें सीखने की आवश्यकता महसूस होती है। विद्यालय एक ऐसी संस्था है जो कि हमारे व्यवहार और गुणों को परिभाषित करती है। विद्यालय के द्वारा ही हम हमारे इतिहास के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं। विद्यालय में ही हमारे पूर्वजों के विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं। अतः कई पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति का स्थानांतरण नई पीढ़ी में करने का कार्य विद्यालय रूपी संस्था करती है।

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