बुद्धि का धीरे धीरे विकास हुआ और बुद्धि के बारे में अलग अलग मनोवैज्ञानिकों ने कई सिद्धांत दिए जिनके बारे में आज इस लेख में हम विस्तार से चर्चा करेंगे।
द्वीकारक सिद्धांत
चार्ल्स स्पीयरमेन ने 1904 में बुद्धि का एक सिद्धांत दिया, जिसे द्वीकारक सिद्धांत कहते हैं। स्पियरमन के अनुसार मानव में दो प्रकार के कारक होते हैं - सामान्य कारक और विशिष्ट कारक।
- सामान्य कारक - सामान्य कारक वह कारक है जो बालक में अनुवांशिकता से आता है। इस कार्य के बिना कोई भी मानसिक क्रिया संभव नहीं है, इसलिए इस कारक को व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा कहा गया। इस कारण पर शिक्षण, प्रशिक्षण, अभ्यास का प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए एक शिक्षक इसका विकास नहीं कर सकता।
- विशिष्ट कारक - यह वह कारक है जो बालक में पर्यावरण से आता है। शिक्षण प्रशिक्षण और अभ्यास के द्वारा इस कार्य का विकास किया जा सकता है। इसलिए एक शिक्षक कक्षा में उचित वातावरण विकसित करके इस कारक का विकास कर सकता है।
किसी भी मानसिक क्रिया के लिए यह दोनों कारक मिलकर कार्य करते हैं। लेकिन इनका अनुपात व्यक्ति से व्यक्ति और एक क्रिया से दूसरी क्रिया में भिन्न-भिन्न होता है।
समूह कारक सिद्धांत
बहू योग्यता का सिद्धांत भी कहा जाता है। थर्स्टन ने 1938 में बुद्धि का एक सिद्धांत दिया, जिसे समूह कारक सिद्धांत कहते हैं। इन्होंने स्पियरमन के सामान्य कारक को अस्वीकार कर दिया और कहा कि मानव में बहुत कुछ समूह कारक होते हैं, जो उससे मिलती-जुलती क्रियाओं का संचालन करते हैं। इन्हें थर्स्टन ने प्रधान कारक कहा था। थर्स्टन इस प्रकार के साथ प्रधान कारकों की बात की और उनके आधार पर एक बुद्धि परीक्षण बनाया जिसे ( प्राइमरी मेंटल एबिलिटी ) प्राथमिक मानसिक योग्यता परीक्षण नाम से जाना जाता है। थर्स्टन के 7 प्रधान कारक निम्न प्रकार हैं -
- शाब्दिक अर्थ
- शब्द प्रवाह
- आंकिक
- तार्किक
- स्मृति
- स्थानिक
- प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक नीति
जो बुद्धि आंख और हाथ के समन्वय बनाने में काम आए उसे प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक बुद्धि कहते हैं।
गिलफोर्ड का बुद्धि सिद्धांत
बुद्धि संरचना सिद्धांत भी कहा जाता है। 1967 में गिलफोर्ड ने बुद्धि का एक सिद्धांत दिया जिसे बहु कारक सिद्धांत कहते हैं, इस सिद्धांत को त्रिविमीय सिद्धांत भी कहते हैं। गिलफोर्ड के सिद्धांत को त्रिविमीय या त्रीआवामी इसलिए कहा गया क्योंकि पहले विषय वस्तु और प्रक्रिया और फिर उत्पाद आएगा।
गिलफोर्ड ने अपने मूल सिद्धांत में चार प्रकार की विषय वस्तु की बात की - आकृति, शाब्दिक, सांकेतिक, व्यवहारिक। गिलफोर्ड ने अपने सिद्धांत में पांच प्रकार की क्रियाओं की बात की -
- मूल्यांकन - जब क्रिया तुलनात्मक विधि में हो तब इसे मूल्यांकन कहते हैं।
- अभिसारी चिंतन - जो चिंतन परंपरागत हो इसे अभिसारी चिंतन कहते हैं, जैसे पेंसिल से लिखना
- अपसारी चिंतन - जो चिंतन परंपरा से हटकर हो मौलिक हो उसे अपसारी चिंतन कहते हैं। जैसे दूध से पनीर बनाना। एक सृजनशील बालक में अपसारी चिंतन का प्रभुत्व होगा।
- स्मृति - जब मस्तिष्क में क्रिया पूर्व अनुभव या स्मृति के कारण होती है, तब उसे स्मृति कहा गया।
- संज्ञान - संज्ञान का अर्थ किसी वस्तु को देख कर उससे अर्थ प्रदान करने की क्रिया है।
गिलफोर्ड ने अपने सिद्धांत में छह प्रकार के उत्पाद बताएं - इकाई, वर्ग, संबंध, पद्धति, रूपांतरण, आशय। गिलफोर्ड के मूल सिद्धांत में कुल 120 वर्ग बनते हैं।
बहु बुद्धि सिद्धांत
1983 में गार्डनर ने बुद्धि का एक सिद्धांत दिया, जिसे बहु बुद्धि सिद्धांत कहते हैं। गार्डनर के मूल सिद्धांत में कुल 7 प्रकार की बुद्धि बताई - भाषाई, तार्किक गणित, स्थानिक, शारीरिक गतिक, संगीतकी, व्यक्तिगत आत्मन, व्यक्तिगत अन्य आत्मन।
यह वह बुद्धि है जो शरीर की मांसपेशियों को नियमित करने में काम आती है। इस प्रकार की बुद्धि का कलाकारों ने नृत्य करने वालों खिलाड़ियों में प्रभुत्व होगा। जो बुद्धि संगीत को समझने में काम आए, उसे संगीतकी बुद्धि कहते हैं। जो बुद्धि अपने समय को समझने में काम आए उसे व्यक्तिगत आत्मन कहते हैं। जो बुद्धि दूसरों के संवेगो को समझने में काम आए उसे व्यक्तिगत अन्य आत्मन कहते हैं।
गार्डनर ने बाद में दो प्रकार की बुद्धि को और जोड़ा 1998 में उन्होंने एक बुद्धि बताई जिसे प्रकृतिवादी बुद्धि कहा गया। यह वह बुद्धि है जो प्रकृति की देन को समझने में काम आती है। 2000 में गार्डनर ने एक और बुद्धि की बात की जिसे अस्तित्व वादी बुद्धि कहा गया। यह वह बुद्धि है जो जीवन के रहस्यों को जैसे - आत्मा, मृत्यु, पांच तत्व आदि को समझने में काम आती है।
सांवेगिक बुद्धि
1970 में मेयर और सलोम्बी ने सांवेगिक बुद्धि का प्रत्यय दिया। लेकिन गोलमेन ने इसे प्रसिद्धि प्रधान की। सांवेगिक बुद्धि की निम्न पांच विशेषताएं होती है -
- अपने संवेगो को पहचानना
- अपने संवेगो पर नियंत्रण करना
- दूसरों के संवेगो को पहचानना
- स्व अभिप्रेरणा
- परानुभूति
गोलमेन कहा अगर व्यक्ति में बुद्धि लब्धि 20% और सांवेगिक बुद्धि 80% है, तब वह किसी के काम में सफल हो जाएगा।
पियाजे का बौद्धिक विकास का सिद्धांत
पियाजे ने बौद्धिक विकास का एक सिद्धांत दिया जिसे संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत कहते हैं। पियाजे के बौद्धिक विकास के सिद्धांत की दो विशेषताएं हैं -
- संगठन - जब बालक के सामने कोई वस्तु आती है, तब वह संगठित करके एक अर्थ देने का प्रयास करता है। इसे बौद्धिक संरचना कहा गया।
- अनुकूलन - जब बालक नवीन वस्तु को ना समझ पाए तब अनुकूलन की क्रिया करता है।
पियाजे वह मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने मनोविज्ञान में स्कीमा शब्द का प्रयोग पहली बार किया। हर बालक अपनी बौद्धिक संरचना का निर्माण खुद करता है, जब उसके सामने कोई नई वस्तु आती है तब वह उसे पहले से बनी बौद्धिक संरचना में व्यवस्थित करने का प्रयास करता है। इसलिए कहा गया कि पियाजे पहले मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बालक को जन्म से ही सक्रिय और क्रियाशील प्राणी माना। अगर बालक नवीन वस्तु को ना समझ पाए, तब वह अनुकूलन की क्रिया करता है। अनुकूलन की क्रिया में दो चीजें घटित होती है -
- आत्मसातकरण - जब बालक नवीन वस्तु को पहले से बने रचना के संदर्भ में वही अर्थ निकालता है, तब इसे आत्मसातकरण कहते हैं।
- समाविष्टिकरण - जब बालक नवीन वस्तु के आने पर अपनी धारणा को बदल देता है इसे समाविष्टिकरण कहते हैं।
पियाजे ने बौद्धिक विकास की चार अवस्थाएं बताई -
संवेदनात्मक गामक अवस्था
0 से 2 वर्ष तक होती है। यह अवस्था जन्म से लेकर 2 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में एक असहाय बालक गतिशील हो जाता है। वह आवाज, ध्वनि की तरफ आकर्षित होता है। वह वस्तुओं को छूने लगता है, उन तक पहुंचने लगता है और उन्हें पकड़ने लगता है।
पूर्व संक्रियात्मक अवस्था
यह अवस्था 2 से 7 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में बालक भाषा और संकेतों का उपयोग करने लगता है। इस अवस्था को दो भागों में बांटा गया -
- पूर्व प्रत्यात्मक काल - यह अवस्था 2 से 4 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में बालक बड़ों का अनुकरण करने लगता है, वह जिज्ञासु हो जाता है। कब, क्यों, कहां जैसे प्रश्नों को पूछना आरंभ कर देता है। इसलिए इस अवस्था को खोज की अवस्था भी कहा जाता है।
- अंत प्रज्ञा काल - यह अवस्था अंत प्रज्ञा काल 5 से 7 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में बालक बड़ों के द्वारा बताए गए तथ्यों को बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेता है।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था
यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में अतार्किक चिंतन तार्किक चिंतन का स्थान ले लेता है। बालक मूर्त वस्तुओं के संबंध में समझने लगता है, उससे उसमें तीन गुण विकसित हो जाते हैं - विलोमिय संबंध, संरक्षण, क्रम बद्धता। वह गिन सकता है, माप सकता है। इसलिए कहा गया कि इस अवस्था में उसे मूर्ख बनाना संभव नहीं होता।
औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था
11 से 15 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में तार्किक चिंतन, अमूर्त चिंतन का विकास हो जाता है। बालक अपनी समस्याओं का समाधान करने लगता है और अपने जीवन में परिकल्पना बनाने लगता है।
वैयक्तिक भिन्नता
वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ व्यक्तियों में अलग-अलग भिन्नता का होना है। विश्व में कोई व्यक्ति ऐसे नहीं जिसमें शत-प्रतिशत समानता होगी। जुड़वा भाई बहनों में भी असमानता पाई जाती है। यही कारण है कि आधार कार्ड में पहचान के लिए अंगुलियों के निशान, आंखों की पुतलियों का फोटो लिया जाता है।
विलियम वुंट की प्रयोगशाला में यह पाया गया कि अगर एक प्रयोग को अलग-अलग लोग करते हैं, तब परिणामों में कुछ अंतर आएगा। वुंट ने इस बुराई के रूप में कहा और यह समझाया कि इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनके विद्यार्थी केटल सहमत नहीं हुए, उन्होंने कहा कि इसका अध्ययन होना चाहिए। इसलिए भारी विरोध के बाद भी कैटल ने अपने शोध का विषय, प्रतिक्रिया काल में वैयक्तिक भिन्नता को लिया। इसलिए मनोविज्ञान में कैटल को वैयक्तिक भिन्नता का जनक माना गया।
स्किनर के अनुसार "व्यक्तिक भिन्नता में संपूर्ण व्यक्तित्व का कोई भी ऐसा पक्ष लिया जा सकता है, जिसका मापन किया जा सके"। रेबर के अनुसार "व्यक्तिक भिन्नता एक ऐसी मनोवैज्ञानिक घटना के लिए नाम लिया जाता है जो उन विशेषताओं या सिविल गुणों पर बल देता है, जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं।
व्यक्तिक भिन्नता के क्षेत्र
- शारीरिक विकास
- मानसिक विकास
- सांवेगिक भिन्नता
- सामाजिक भिन्नता
- शैक्षणिक उपलब्धियों का अंतर
- व्यक्तित्व का अंतर
- भाषा विकास का अंतर
- रूचियों का अंतर
- विषमता का अंतर

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