सामाजिक विकास वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों के अनुसार व्यवहार करता है तथा अन्य लोगों से सहयोग करना सीखता है, समाज में रहकर ही वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और जन्मजात शक्तियों और प्रवृत्तियों का विकास करता है। उसकी समस्त शक्तियों का विकास तथा आचरण व्यवहार का परिमार्जन और सामाजिक गुणों का विकास सामाजिक वातावरण में संभव है। समाज में रहकर ही दूसरों से संबंध स्थापित करता है अपने समाज में अनुकूलन स्थापित करने की योग्यता ही सामाजिक विकास कहलाती है।
सामाजिक विकास की परिभाषाएं
हरलॉक के अनुसार "सामाजिक विकास का अर्थ सामाजिक संबंधों में परिपक्वता को प्राप्त करना है"। सोरेनसन के अनुसार "सामाजिक अभिवृद्धि और विकास का तात्पर्य अपनी और दूसरों की उन्नत सही के लिए योग्यता वृद्धि है"। रॉस के अनुसार "सहयोग करने वाले लोगों में हम भावना का विकास और उनके साथ काम करने की क्षमता का विकास तथा संकल्प सामाजिकरण है"।
फ्रीमैन और शोवल के अनुसार "सामाजिक विकास सीखने की वह प्रक्रिया है जो समूह के स्तर परंपराओं और रीति-रिवाजों को अपने अनुकूल अपने आप को डालने तथा एकता मेलजोल और पारस्परिक सहयोग की भावना को बढ़ाने में सहायक होती है"।
शैशावस्था में सामाजिक विकास
प्रथम माह का शिशु की किसी वस्तु को या व्यक्ति को देखकर कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं करता। वह तीव्र प्रकाश व ध्वनि के लिए प्रतिक्रिया अवश्य करता है। दूसरा माह में शिशु आवाजों को पहचानने लगता है। जब कोई व्यक्ति उसे बात करता है, ताली बजाता है, खिलौने दिखाता है तो वह आवाज सुनकर सिर घूमाता है।
तीसरा माह में शिशु अपनी मां तथा परिवार के सदस्यों को पहचानने लगता है। चौथा माह में शिशु पास आने वाले व्यक्ति को देख कर हंसता है, मुस्कुराता है और जब कोई व्यक्ति उसके साथ खेलता है तो वह भी खेलता है और अकेला रह जाने पर वह रोने लगता है।
पांचवा माह में शिशु प्रेम व क्रोध में अंतर समझने लगता है। दूसरे व्यक्ति के आने पर अथवा प्रसन्न होने पर भी हंसता है तथा किसी के नाराज होने पर, डांटने पर सहम जाता है। आठवां माह में वह बोले जाने वाले शब्दों और हाव-भाव का अनुकरण करने लगता है।
प्रथम वर्ष में वह मना करने वाले कार्यों को नहीं करता। दूसरा वर्ष में बड़ों के साथ घर का कार्य करने लगता है इस प्रकार व परिवार का सक्रिय सदस्य बन जाता है। 2 से 3 वर्ष में सामाजिक विकास तीव्र गति से होता है उसकी रूचि खिलौनों से हटकर उसके साथ खेलने वाले साथियों में हो जाती है। वह खेलने के लिए साथी बनाने लगता है और उनसे सामाजिक संबंध स्थापित करता है।
4 वर्ष का शिशु नर्सरी विद्यालय में प्रवेश लेता है वह एक नई सामाजिक दुनिया में प्रवेश करता है। 5 वर्ष का शिशु दूसरे बच्चों के सामूहिक जीवन से अनुकूल अनुकूलन करता है और अपने साथियों के साथ साझेदार बनता है। 6 वर्ष शिशु में नैतिक भावनाओं का विकास आरंभ हो जाता है।
बाल्यावस्था में सामाजिक विकास
बाल्यावस्था में सामाजिकरण गति तीव्र हो जाती है। बालक प्राथमिक विद्यालय में जाना प्रारंभ कर देता है नए वातावरण तथा नए साथियों के संपर्क उसमें अनुकूलन समायोजन तथा सामाजिक भावनाओं का विकास होता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बाल्यावस्था में सामाजिक विकास में निम्नलिखित प्रकार से होता है।
बालक विद्यालय जाने लगता है। यहां पर एक नए वातावरण से अनुकूलन करना सामाजिक कार्यों में भाग लेना, मित्र बनाना सीखना है। अपने माता-पिता तथा अन्य बड़ों की छत्रछाया से अपने आप को मुक्त करता है तथा उनके साथ कम से कम समय बिताना चाहता है।
अब उसे उनके साथ खेलने कूदने में आनंद नहीं आता उसे अपनी आयु के बालकों के साथ खेलना अच्छा लगता है। अपने समूह विशेष के प्रति गहरी आस्था या भक्ति भाव पाया जाता है दूसरी पीढ़ियों के दृष्टिकोण और विचारों में अंतर के कारण माता-पिता तथा अध्यापकों की मान्यताओं का बालक की टोली की मान्यताओं और आदर्शों से प्राय टकराव होता है।
समूह के सदस्य के रूप में बालक बालिकाओं के अंदर अनेक सामाजिक गुणों का विकास होता है। उत्तरदायित्व सहयोग साहस, सहनशीलता, आत्म नियंत्रण, न्याय प्रियता आदि गुण बालक में धीरे-धीरे उदय होने लगते हैं। बालक बालिकाओं की सूचियों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। लड़कों द्वारा दौड़ भागने वाले खेल कूद और घर के बाहर घूमने जैसे कार्यो में अधिक रुचि पाई जाती है। जबकि लड़कियां नाच गाना कढ़ाई बुनाई घरेलू कार्यों में अधिक रूचि रखती है।
बालकों में सार्वजनिक सम्मान की भावना अधिक पाई जाती है तथा नेतृत्व के गुणों का विकास हो जाता है। बहुधा बालक उन्हीं कार्यों को करना पसंद करते हैं जिन्हें वह उचित समझते हैं वह अपनी बुद्धि के अनुकूल सामाजिक कार्य करते हैं। प्राय से बालक जिन्हें परिवार एवं साथियों में प्रसन्नता सम्मान और मान्यता नहीं मिलती उद्दंड बन जाते हैं। इस प्रकार के बालक का व्यवहार सब के लिए चिंताजनक होता है यह बालक समस्यात्मक बालक बन जाते हैं।
इस अवस्था में बालक कहीं प्रकार के खेल खेलते हैं इन्हीं के लोगों के द्वारा व सामाजिक संपर्क स्थापित करते हैं जिससे सहयोग से खेलना तथा सामाजिक नियमों का पालन करना सीख जाते हैं।
सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
- अनुवांशिकता
- विद्यालय
- परिवार
- साथियों का समूह
- अध्यापक
- शारीरिक तथा मानसिक विकास
- संवेगात्मक विकास
- आस-पड़ोस
- आर्थिक स्थिति
- धार्मिक संस्थाएं
- सूचना एवं मनोरंजन के साधन

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