समप्रत्यय निर्माण का विकास

अधिगम का मूल आधार प्रत्यय होता है। प्रत्यय समान विशेषता वाले उद्दीपको का एक समूह होता है, जिससे इसी वर्ग में पाई जाने वाली वस्तुओं तथा उनके सामान्य गुणों का बोध होता है। उदाहरणार्थ - बालक पहली बार गाय को देखकर गाय के चार पैरों, पूँछ, सीँग, रंग के आधार पर उसकी एक छवि का निर्माण मस्तिष्क में कर लेता है। कुछ समय बाद जब वह पुनः कभी गाय के को देखता है तो पुराने अनुभव के आधार पर उसे पहचान लेता है।

प्रत्यय की परिभाषाएं

बोरिंग एवं लेंगफील्ड के अनुसार "प्रत्यय किसी सामान्य वर्ग को व्यक्त करने वाला सामान्य विचार है।"

वुडवर्थ के अनुसार "प्रत्यय विचार है जो जो वस्तुओं, घटनाओं, गुणों आदि का उल्लेख करते हैं।

प्रत्यय की विशेषताएं

  1. प्रत्यय सभी प्रकार के अधिगम की एक बुनियादी इकाई है।
  2. प्रत्यय किसीदेखी हुई वस्तु के सामान्य गुणों को प्रस्तुत करता है।
  3. सभी जातिवाचक और भाववाचक संज्ञाए प्रत्यय हैं।
  4. प्रत्यय प्रत्यक्षीकरण या करुणा द्वारा विचार को एक अर्थ प्रदान करने के योग्य बनाता है।
  5. प्रत्यय उद्दीपको का ऐसा समूह है जिसमें कुछ समान विशेषताएं होती है। उद्दीपन वस्तु घटना या व्यक्ति के रूप में होती है।
  6. कुछ प्रत्यय का अधिगम आसानी से हो जाता है और कुछ का कठिनाई से जैसे कुत्ता, बिल्ली, पेड़ आदि मूर्त का आसानी से अधिगम हो जाता है, परंतु जिन्हे देखना संभव नहीं होता उनका अधिगम कठिनाई से होता है, जैसे ईश्वर, आत्मा, ऊर्जा आदि।
  7. प्रत्यय अनुभव पर आधारित होते हैं। अनुभव में वृद्धि के साथ प्रत्यय की संख्या में भी वृद्धि होती जाती है।
  8. सभी समप्रत्यय का उपयोग भिन्न-भिन्न होता है, उदाहरणार्थ गणित में गिनती और पहाड़ों का उपयोग बहुत होता है, जबकि अनुपात और औसत का उपयोग विशिष्ट आवश्यकताओं में होता है।
  9. प्रारंभ में प्रत्यय अस्पष्ट होते हैं परंतु जैसे ज्ञान और अनुभव में वृद्धि होती है वह स्पष्ट और निश्चित स्वरूप धारण कर लेते हैं।
  10. एक ही वस्तु के प्रति भिन्न भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रत्यय बन सकते हैं।

प्रत्यय के प्रकार

#1 मूर्त या जाति वाचक प्रत्यय

जो मूल पदार्थ दिखाई पड़ने वाले होते हैं वह मूर्त या जातिवाचक प्रत्यय होते हैं। मूर्त या जातिवाचक संप्रत्यय का संबंध व्यक्ति, वस्तु तथा पदार्थ से होता है। बालक की मस्तिष्क में जातिवाचक संप्रत्यय पहले से ही निर्मित होता है।

#2 अमूर्त या भाववाचक संप्रत्यय

मूर्त प्रत्यय के निर्माण के बाद अमूर्त प्रत्यय का निर्माण होता है। इस प्रकार का संप्रत्यय व्यक्ति या वस्तुओं के गुणों से संबंधित होता है। बालक में पहले जाति वाचक प्रत्यय का निर्माण होता है बाद में भाववाचक का। उदाहरणार्थ - बालक लकड़ी देखता है तथा उससे संबंधित प्रत्यय मूर्त प्रत्यय होता है और बालक लकड़ी की कठोरता को समझता है यह अमूर्त प्रत्यय होता है।

प्रत्यय का निर्माण

निम्न चरणों में होता है। प्रथम चरण में निरीक्षण, द्वितीय चरण में तुलना, तृतीय चरण में पृथक्करण, चतुर्थ चरण में सामान्यीकरण और पंचम चरण में परिभाषी करण।

#1 निरीक्षण

बालक बोलने से पहले ही प्रत्यय का निर्माण करने लगता है वह किसी वस्तु को देखता है तो उसके मानसिक प्रतिमानों का निर्माण करता है। जैसे - बालक किसी गाय को देखता है और उसकी विशेषताओं को अपने मस्तिष्क में धारण कर लेता है।

#2 तुलना

मान लीजिए बच्चे ने काली रंग की गाय देखी और फिर लाल रंग की गाय देखी तो वह दोनों प्रत्यय की तुलना करता है। दोनों के रंग भिन्न-भिन्न होते हुए भी वह उन में समानता पाता है।

#3 पृथक्करण

बालक दोनों गायों की भिन्नता और समानता को अलग करता है। भिन्नता केवल रंग के कारण है समानता अनेक है। बालक इन समानता हो या गुणों को भिन्नता से अलग कर देता है।

#4 सामान्यीकरण

मस्तिष्क में सामान्य प्रत्यय बन जाने के बाद वह अधिकाधिक स्पष्ट होने लगता है। सामान्य गुणों के संग्रह के कारण विभिन्न रंगों की गायों में कोई अंतर नहीं रह जाता। अतः गाय का प्रत्यय स्पष्ट रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार उसे किसी भी गाय को पहचानने में कठिनाई नहीं होती है।

#5 परिभाषीकरण

उपयुक्त चार स्तरों से गुजरने के बाद बालक गाय के प्रत्यय का निर्माण कर लेता है। उसे गाय का सामान्य ज्ञान हो जाता है जब हम गाय कहते हैं तो बालक चार पैरों वाले पशुओं से गाय को समझ जाता है। यही वास्तविक प्रत्यय है।

बालकों के प्रत्यय के विकास में अध्यापक की भूमिका

  1. अस्पष्ट व धूमिल समप्रत्यय को स्पष्ट करना।
  2. नए समप्रत्यय के निर्माण में सहायता करना।
  3. बालकों द्वारा पूर्व अर्जित प्रत्यय को परिभाषित करना।
  4. प्रत्यय विकास में भ्रमण या पर्यटन बहुत सहायक होता है, अध्यापकों को शैक्षिक भ्रमण का आयोजन करना चाहिए।
  5. अध्यापक को अपने शिक्षण को श्रव्य दृश्य माध्यमों से प्रत्यय निर्माण के लिए उपयोगी बनाना चाहिए।
  6. बालकों को एक ही वस्तु के संबंध में भिन्न-भिन्न अनुभव अलग-अलग परिस्थितियों में कराना चाहिए।
  7. अध्यापकों को प्रत्यय के धनात्मक अंतरण का प्रयास करना चाहिए बालक पहले से किसी वस्तु का प्रत्यय जानता है तो उसे नवीन प्रत्यय से संबंध करने का प्रयास करना चाहिए अर्थात बालकों को ज्ञात से अज्ञात की ओर ले जाना चाहिए।

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