संवेग प्राणी का वह आंतरिक अनुभव है जिसमें उसकी मानसिक स्थिति एक उथल-पुथल के रूप में व्यक्त होती है। संवेग का अंग्रेजी रूपांतरण Emotion है, जो लेटिन भाषा के शब्द emovere से बना है जिसका अर्थ उत्तेजित करना होता है। वास्तव में संवेग एक जटिल अवस्था है जिसमें कुछ शारीरिक प्रतिक्रिया है जिससे हृदय की गति में परिवर्तन, रक्तचाप में परिवर्तन आदि होते हैं।
इनके अलावा शरीर के बाहरी अंगों जैसे हाथ, पैर, आंख, चेहरा आदि में परिवर्तन होना, जिसे देखकर समझा जा सकता है कि बालक संवेग की स्थिति में है।
संवेग की परिभाषाएं
क्रो और क्रो के अनुसार "एक संवेग इस प्रकार से एक भावनात्मक अनुभव है, जो व्यक्ति में सामान्यतः सामान्य क्रम आंतरिक समायोजन और मानसिक तथा शारीरिक रूप से उत्तेजित दशाओं के साथ साथ होता है और उसके भाई है व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देता है"।
गैलडार्ड के अनुसार "संवेग क्रियाओं का उत्तेजक है"।
बैरोन और बर्न के अनुसार "संवेग से तात्पर्य एक ऐसी आत्म निष्ठ भाव की उस अवस्था से होता है। इसमें कुछ शारीरिक उत्तेजना पैदा होती है और फिर उसमें खास खास व्यवहार होते हैं"।
इंग्लिस तथा इंग्लिस के अनुसार "संवेग एक जटिल भाव की अवस्था होती है। जिसमें कुछ खास खास शारीरिक तथा ग्रंथियों क्रियाएं होती है।
संवेगो की विशेषताएं
- संवेगो में व्यापकता पाई जाती है, संवेग पशु पक्षी बालक वृद्ध सभी में पाए जाते हैं।
- मनुष्य की सभी दशाओं एवं अवस्थाओं में सम्मिलित पाए जाते हैं।
- संवेगात्मक अनुभूतियों के साथ-साथ कोई न कोई मूल प्रवृत्ति अथवा मूल आवश्यकता जरूर जुड़ी रहती है।
- सामान्य रूप में संवेग की उत्पत्ति प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से होती है।
- किसी भी समय को जागृत करने के लिए भावनाओं का होना आवश्यक है।
- प्रत्येक संवेगात्मक अनुभूति व्यक्ति में व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक संबंधी परिवर्तन को जन्म देती है।
- संवेगो में अस्थिरता पाई जाती है।
- संवेग मनु शारीरिक होता है।
- संवेग की दशा में बुद्धि काम नहीं करती है।
- समय पर परिस्थिति और ग्रंथियों का प्रभाव पड़ता है।
- संवेग का परिणाम कोई क्रिया आवश्यक होती है।
- सम्यक प्रकाशन हर एक व्यक्ति व्यक्तिगत ढंग से करता है।
संवेगो के प्रकार
संवेग अनेक प्रकार के होते हैं "मैकडुगल ने 14 मूल प्रवृत्तियों के कुल 14 संवेगो का उल्लेख किया है, जिसमें से प्रत्येक संवेग एक एक मूल प्रवृत्ति से संबंधित होता है। यह 14 संवेग तथा संबंधित मूल प्रवृत्तियां नीचे दी गई हैं। बाईं ओर मूल प्रवृत्तियां दर्शाई गई है तथा दाएं ओर उनसे संबंधित संवेग दर्शाए गए हैं।
- पलायन - भय
- युयुत्सा - क्रोध
- निवृत्ति - घृणा
- संतान कामना - वात्सल्य
- शरणागति - करुणा
- काम प्रवृत्ति - काम उत्साह
- जिज्ञासा - आश्चर्य
- दैन्य - आत्महीनता
- आत्म गौरव - आत्म अभिमान
- सामूहिकता - एकाकीपन
- भोजन तलाश - भूख
- संग्रहण - अभिकास
- रचना धर्मिता - कीर्ति भाव
- हास - आमोद
संवेगात्मक विकास की विशेषताएं
- संवेगात्मक विकास शिशु, बाल्य, किशोर एवं अन्य अवस्थाओं में क्रम से होता है।
- बालक ज्यों ज्यों बड़ा होता है, उसके संभागों में जटिलता आती जाती है।
- संवेगात्मक विकास में जो अनुभव होते हैं, उनकी वृद्धि से परिपक्वता आती है।
- संवेगात्मक विकास प्राणी के व्यवहारों से संबंधित होता है।
- संवेगात्मक विकास संभागों के प्रशिक्षण ( संदेशों पर नियंत्रण उचित ढंग से और यथा आवश्यकता प्रकट करना और उनका शोधन करना ) पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है।
शैशावस्था में संवेगात्मक विकास
शिशु जन्म के समय रोता चिल्लाता और पैर पटकता है। इस प्रकार वह जन्म के समय से ही संवेगात्मक व्यवहार की अभिव्यक्ति करता है। शिशु का संवेगात्मक व्यवहार अत्यधिक स्थिर होता है शिशु का संवेग थोड़े समय तक रहता है और शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। आरंभ में शिशु के समय काफी तीव्र होते हैं, किंतु धीरे-धीरे तीव्रता कम होती जाती है।
शिशु की संवेगात्मक अभिव्यक्ति में क्रमश परिवर्तन होता है शिशु आरंभ में प्रसन्न होने पर केवल मुस्कुराता है। कुछ बड़ा होने पर वह हंसकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करता है। आरंभ में शिशु के संवेग में अस्पष्टता होती है लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है उसके संभागों में स्पष्टता आने लगती है।
बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास
क्रो और क्रो के अनुसार "बाल्यावस्था के संपूर्ण वर्षों में संभागों की अभिरुचि में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं"। इससे स्पष्ट होता है कि बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास के साथ परिवर्तन भी होते रहते हैं। इस अवस्था में आते ही संवेगो में सामाजिकता का भाव आ जाता है।
उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि सामाजिक जीवन में कब किस प्रकार के भावों को व्यक्त करना उचित है अर्थात बालक संवेग ऊपर नियंत्रण करना प्रारंभ कर देते हैं। बाल्यावस्था में होने वाले संवेगात्मक परिवर्तनों की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्न है।
संवेग ओं की उग्रता में कमी आ जाती है। शैशावस्था की भांति उग्र रूप से अभिव्यक्त नहीं होते हैं। समाजीकरण के प्रारंभ होने के फलस्वरूप संवेगो का दमन करने का प्रयास करता है अथवा उनका शिष्ट ढंग से अभिव्यक्त करता है। माता-पिता अध्यापक तथा अन्य बड़े व्यक्तियों के समक्ष वह ऐसे संवेगो को प्रकट नहीं करता, जिनको अवांछनीय समझा जाता है।
बाल्यावस्था में शैशावस्था की भांति भय उत्पन्न नहीं होता बालकों में भय का संबंध अधिकतर भावी कार्यों से होता है। जैसे - गृह कार्य न करने पर अथवा ना पढ़ने लिखने पर माता-पिता तथा अध्यापक का भय, परीक्षा में सफल होने की चिंता तथा असफल होने का भय। बाल्यावस्था में परिवार समाज या विद्यालय के सख्त नियमों से बालक में निराशा और असहायपन का भाव बड़ी तीव्रता से पैदा होता है। उन्हें लगता है कि वह बिल्कुल अकेले हैं तथा उनकी इच्छाएं पूरी न होने पर उन्हें लगता है कि कोई उन्हें प्यार नहीं करता।
बालक को अपने कार्य मैं सुख-दुख की अनुभूति होती है, सफलता एवं असफलता से संतोष तथा असंतोष की भावना बालक में पाई जाती है। बाल्यावस्था में बालक किसी न किसी समूह का सदस्य होता है। वह उस समूह के क्रियाकलापों में भाग लेता है किसी न किसी कारण वह समूह के दूसरे सदस्यों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, घृणा की भावना रखता है। बालक से 7 वर्ष की आयु से ही अपने वातावरण की वस्तुओं के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु होता है उन वस्तुओं से संबंधित भिन्न भिन्न प्रकार के प्रश्न करता है।
संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
- बुद्धि
- स्वस्थ स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास
- पारिवारिक वातावरण और आपसी संबंध
- विद्यालय का वातावरण और अध्यापक
- सामाजिक विकास एवं साथियों के साथ संबंध
- आस-पड़ोस समुदाय एवं समाज
संवेगो का प्रशिक्षण
मार्गांतिकरण
संवेग का विकास आयु विशेष और वातावरण विशेष में होता है। संवेगो को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता और करना भी नहीं चाहिए, क्योंकि इनके दमन से बालकों में मानसिक ग्रंथियां बन जाती है जो उनके विकास में बाधक होती है। तब आवश्यकता है कि इन्हें उचित दिशा में मोड़ा जाए इसी को मार्गांतिकरण कहते हैं। भय मनुष्य के विकास में बाधक होता है, यदि भय को हम ईश्वर की ओर प्रवर्तित कर देते हैं तो वह उस उसे सद्मार्ग की ओर प्रवर्त कर देता है।
शोधन
मार्गांतिकरण में संवेगो का प्राकृतिक रूप नहीं बदलता इसलिए परिस्थिति विशेष के हटते ही बालकों को पुनः अन्यथा क्रिया की ओर प्रवृत्त कर सकते हैं। इसलिए अब उनके शोधन पर बल दिया जाता है, शोधन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा संवेगो को प्राकृतिक रूप में ही परिवर्तन कर दिया जाता है। काम का संवेग मनुष्य को भोग की ओर प्रवृत्त करता है, यदि इससे हम सौंदर्य अथवा साहित्य सृजन में बदल देते हैं तो बालक भोग की ओर जाने से बच जाते हैं और सत्कर्मो में प्रवृत्त हो जाते हैं।
रेचन
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से संवेगो का दमन बहुत हानिकारक होता है, कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती है जब न तो संवेगो का मार्गांतिकरण किया जा सकता है। न शोधन मनोवैज्ञानिक ऐसे संवेगो का अन्य स्थितियों में प्रकाशन कर उनकी तीव्रता कम करने में विश्वास रखते हैं, इसे ही रेचन कहा जाता है। उदाहरणार्थ - क्रोध के संवेग को हम बालकों को खेलकूद में प्रकट करके सामान्य जीवन में इसकी तीव्रता को कम कर सकते हैं तथा नाटक में क्रोधित पात्र की भूमिका देकर उसे बाहर निकाल सकते हैं।
यह बात समझ लेनी चाहिए कि कभी यह कार्य मार्गांतिकरण द्वारा करना ठीक है। कभी शोधन द्वारा कभी रेचन द्वारा, अध्यापकों को बालक की आयु, उनकी प्रकृति और वातावरण। इन सभी को ध्यान में रखकर संवेगो को प्रशिक्षित करना चाहिए। पाठ्य सहगामी क्रियाएं (नाटक, खेल, स्काउटिंग, भ्रमण आदि ) के माध्यम से भी विद्यार्थियों का उचित ढंग से संवेगात्मक विकास विकास और प्रशिक्षण किया जा सकता है।

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