चिंतन के विभिन्न प्रकारों में सृजनात्मक चिंतन या सृजनशीलता को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी योग्यता के कारण नवीन या समस्यात्मक परिस्थिति में समायोजन स्थापित करने एवं नवीन हल प्राप्त करने में कोई व्यक्ति सफल होता है। समस्या समाधान में कोई नवीन खोज करना आवश्यक नहीं होता जबकि सृजनात्मक चिंतन में मौलिकता का होना आवश्यक है अर्थात जो उपलब्धि या समाधान प्रस्तुत किया जाता है वह अपने आप में नया होता है इसे सृजनात्मकता कहते हैं।
सृजनात्मक चिंतन की परिभाषाएं
बैरन के अनुसार "सृजनात्मकता का अर्थ ऐसे कार्य से है जो नवीन तथा उचित भी हो"।
बोर्न के अनुसार "किसी समस्या के लिए मौलिक व्यवहारिक उत्तर यह समाधान प्रस्तुत करने के व्यवहार की व्याख्या के लिए सृजनशीलता का उपयोग किया जाता है"।
रैथस के अनुसार "सृजनशीलता प्रस्तुत समस्याओं के लिए नवीन समाधान उत्पन्न करने की योग्यता है"।
सृजनात्मकता की अवस्थाएं
सृजनात्मकता की पैट्रिक एवं मार्क्स ने चार अवस्थाएं बताई है जो कि निम्नांकित है -
- तैयारी - सृजनात्मक चिंतन की यह प्रारंभिक अवस्था है। इसमें व्यक्ति परिस्थिति की छानबीन करता है तथा व्यवहार अत्यधिक परिवर्तनशील हो जाता है।
- खोज प्रक्रम - यह वह लघु कालिक अवधि है जिसमें कुछ विलंब से एक निश्चित प्रकार का विचार पैदा होता है।
- प्रकाश अवस्था - इस अवस्था में खोज प्रक्रम से उत्पन्न विचारों को किसी लक्ष्य से संबंधित कर लिया जाता है।
- जांच - यह अंतिम अवस्था है इसमें उत्पन्न विचारों की जांच, आलोचना, परिमार्जन, सरलीकरण या विस्तार किया जाता है।
सृजनशीलता का मापन
सृजनशीलता की खोज या मापन आजकल मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा किया जाता है। विद्यालयों में छोटे बच्चों में सृजनशीलता का अनुमान लगाने के लिए उनसे समाधान एवं कहानियां लिखने को कहा जाता है। इससे यह ज्ञान करने का प्रयास किया जाता है कि उनके द्वारा किए गए समाधान हो या उनकी रचनाओं में मौलिकता है।
वैसे ऐसे अनुमान आत्मनिष्ठ होते हैं फिर भी बच्चों के चिंतन में मौलिकता, नवीनता एवं प्रवीणता के संकेत मिलते हैं। सृजनशीलता के मापन से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ है कि सृजनशीलता लक्षण समस्त में अनेक विशेषताएं पाई जाती है। इसमें नव्यता, अनुरूपता, स्वायत्तता की इच्छा, उच्च आकांक्षा, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, कल्पना एवं स्वर चयनित सूचियों को मूर्त रूप देने की इच्छा।
सृजनात्मकता चिंतन के निर्धारक
सृजनात्मक चिंतन अथवा सृजनशीलता पर निम्नांकित कारकों का प्रभाव पड़ता है -
#1 व्यक्तित्व
कुछ अध्ययनों से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ है कि व्यक्तित्व के कुछ गुण सृजनशीलता को प्रभावित करते हैं। इस योग्यता के व्यक्तियों में कुछ प्रमुख लक्षण पाए जाते हैं जैसे - आत्मविश्वास, जिज्ञासा, साहस, आत्मकेंद्रित आदि।
#2 बुद्धि
उच्च मानसिक योग्यता सृजनात्मकता क्षमता में वृद्धि करती है। मार्क्स के अनुसार अधिकतर सर्जनात्मक वैज्ञानिकों की मानसिक योग्यता भी उच्च होती है परंतु इसका आशय यह नहीं है कि उच्च बुद्धि के सभी व्यक्ति सृजनात्मक ही होंगे।
#3 अभिप्रेरणा
सृजनात्मक चिंतन पर जिज्ञासा आकांक्षा स्तर का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। जिन छात्रों में उपलब्धि की प्रेरणा अधिक होती है उनमें सृजनशीलता अधिक पाई जाती है।
#4 पारिवारिक संरचना एवं पर्यावरण
जिन परिवारों में बच्चों को दंडित करके रखा जाता है उनमें संवेदनशीलता का विकास कम होता है इस प्रकार उन परिवारों तथा अभावग्रस्त बालकों में यह योग्यता कम पाई जाती है।
सर्जनशीलता को प्रोत्साहित करना
- समय - बच्चों का सारा समय पूर्ण अनियंत्रित नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें खेलने सोचने विचारने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
- एकांत - सर्जनशील होने के लिए यह भी आवश्यक है कि बच्चों को दबाव से मुक्त रखा जाए और चिंतन के लिए एकांत का अवसर मिले।
- प्रोत्साहन - बच्चों को सर्जनशील होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उनके कार्यों के लिए उनकी हंसी नहीं उठानी चाहिए।
- सामग्रियां - खेल तथा अन्य सामग्रियां एवं उपकरणों की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि उनमें अन्वेषण आत्मक व्यवहार उत्पन्न हो सके।
- माता-पिता एवं बालक संबंध - माता-पिता को चाहिए कि बच्चों में आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करें, जिससे उनमें सर्जनशील व्यवहार उत्पन्न हो।
- ज्ञानार्जन का अवसर - बच्चों को ज्ञानार्जन को का अधिक से अधिक अवसर मिलना चाहिए इससे उनकी सोच बहुमुखी होगी और सर्जनशीलता का मार्ग प्रशस्त होगा।

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