शारीरिक अभिवृद्धि से अभिप्राय है, शरीर के विभिन्न अंगों का विकास और उनकी कार्य क्षमता जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तक व्यक्ति निरंतर बदलता रहता है। यह बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक कभी भी स्थिरता की अवस्था में नहीं होता और वह प्रौढ़ावस्था को ग्रहण करता है।
इस प्रकार विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जिसका प्रारंभ जन्म से ही प्रारम्भ हो जाता है। मानव शरीर का विकास गर्भावस्था से प्रारंभ होता है, गर्भावस्था के विकास को जन्म पूर्व अधिकारीक विकास भी कहा जाता है।
शारीरिक विकास द्वारा प्रभावित क्षेत्र
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शारीरिक विकास निम्न चार क्षेत्रों को प्रभावित प्रभावित करता है।
#1 स्नायु मंडल
स्नायु के विकास के साथ बुद्धि विकास में वृद्धि होती है। इससे उसके व्यवहार को एक नया रूप मिलता है बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी विभिन्न परिस्थितियों को समझने की योग्यता से प्रत्यक्ष रुप से संबंधित है।
#2 मांसपेशियों में वृद्धि
मांसपेशियों की वृद्धि होने के साथ उसकी शक्ति में विकास होता है जो कि बालक की क्रियाशीलता में और उन क्रियाओं में दिखाई देता है। जो परिवर्तित होती रहती है, विकास की सभी अवस्थाओं में बालक के खेलकूद उसकी मांसपेशियों के विकास पर निर्भर होते है।
#3 अंत स्त्रावी ग्रंथियां
अंत स्त्रावी ग्रंथियों के कार्यों में परिवर्तन होने से नवीन परिवर्तित व्यवहारों का प्रकाशन होता है।
#4 संपूर्ण शारीरिक ढांचा
संपूर्ण शारीरिक ढांचे में परिवर्तन से उसकी शारीरिक रचना, लंबाई, भार, शारीरिक भाग आदि बालक के व्यवहार को प्रभावित करते है। शरीर का विकास अच्छे स्वास्थ्य पर निर्भर होता है। शारीरिक विकास और स्वास्थ्य का व्यक्ति के व्यवहार पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
शारीरिक विकास के नियम
मनुष्य के शारीरिक विकास के कुछ महत्वपूर्ण नियम है जो की निम्न प्रकार है।
#1 मस्तकोंमुखी नियम
यह नियम शारीरिक विकास की दिशा को निर्देशित करता है। इस नियम के अनुसार पहले सिर के भाग और फिर क्रमशः धड़, हाथों और पैरों का विकास होता है।
#2 विकास चक्र का नियम
मनोवैज्ञानिक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि संपूर्ण मानव विकास की प्रक्रिया 4 चक्रों में होती है।
- प्रथम चक्र जन्म से 2 वर्ष
- द्वितीय चक्र 2 से 11 वर्ष
- तृतीय चक्र 11 से 15 वर्ष
- चतुर्थ चक्र 15 से 18 वर्ष
प्रथम चक्र में शारीरिक विकास बड़ी तीव्रता से होता है, द्वितीय चक्र में विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रहती है, तृतीय चक्र में विकास की गति पुनः तीव्र हो जाती है और चतुर्थ चक्र में विकास की गति पुनः धीमी हो जाती है।
इससे स्पष्ट है कि शारीरिक विकास एक एक समान गति से नहीं होता। विकास की यह गति पृथक आयु अंतराल में भिन्न-भिन्न होती है। हरलॉक के अनुसार "विकास लयात्मक होता है, नियमित नहीं"। थॉमसन के अनुसार "मानव शरीर के समग्र रूप में विकास नहीं करता, न ही सभी दिशाओं में एक साथ विकास होता है।

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