स्किनर के अनुसार सीखना व्यहवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है। गिल्फोर्ड के अनुसार व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है। कॉलविन के अनुसार पहले से निर्मित व्यवहार में अनुभव द्वारा परिवर्तन को अधिगम कहते है। वुडवर्थ के अनुसार किसी भी ऐसी क्रिया जो व्यक्ति के विकास में सहायक होती है और उसकी वर्तमान व्यवहार और अनुभवों को जो कुछ हो सकते थे, भिन्नता स्थापित करती है सीखने की संज्ञा दी जा सकती है।
अधिगम के फलस्वरुप व्यक्ति के प्रत्यक्षीकरण में परिवर्तन आते है। सीखने के आधार पर वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की भी क्षमता बढ़ती है। सीखने की प्रक्रिया के कारण कुछ उत्प्रेरक हो सकते है। जो कार्य इन प्रेरकों को संतुष्ट करते हैं व्यक्ति उम्र कार्य को दोहराने का प्रयास करता है। इस प्रकार व्यक्ति धीरे-धीरे नए व्यवहार सीख जाता है या पुराने व्यवहार में परिवर्तन करता है। इस प्रकार अधिगम एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
थोर्नडाईक के सीखने के नियम
थोर्नडाईक के सीखने के कुछ नियम भी है जो कि निम्न प्रकार है।
#1 प्रभाव का नियम
प्रभाव के नियम में तात्पर्य सीखे जाने वाले कार्य का सीखने वाले के लिए महत्व से है। जब हमें सीखने के परिणाम से संतोष सुख या प्रसन्नता प्राप्त होती है तो हमें सीखने की ओर तत्परता से जुट जाते हैं और शीघ्रता से सीख जाते है।
थोर्नडाईक ने स्पष्ट किया कि जब एक स्थिति और प्रतिक्रिया के बीच एक परिवर्तनीय संबंध बन जाता है और संतोषजनक अवस्था हो जाती है तो उससे संयोग की शक्ति बढ़ जाती है जब इस संयोग के साथ या उसके बाद दुखदाई स्थिति पैदा हो जाती है तो उसकी शक्ति घट जाती है।
प्रस्तुत नियम में संतोषजनक अवस्था एवं असंतोषजनक व्यवस्था को महत्व दिया जाता है। संतोषजनक अवस्था को वो सीखने वाला छोड़ना नहीं चाहता और असंतोषजनक अवस्था की पुनरावृति नहीं चाहता है।
#2 तत्परता का नियम
सीखने की दशा में तंत्रिका तंत्र में उद्दीपको और प्रतिक्रियाओं के बीच संयोग बन जाता है इनसे संयोगो को s-r सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जब सीखने वाला अपनी ज्ञानेंद्रीयो और कर्मेन्द्रियों में तत्परता उत्पन्न कर लेता है, तो कार्य को जल्दी सीख लेता है।
#3 अभ्यास का नियम
उद्दीपक और प्रतिचार के बीच परिवर्तन लिए संबंधों को अभ्यास कहा जाता है। प्रारंभ में थोर्नडाइक ने देखा कि उददीपक प्रतिचार के संबंधों को पुरस्कार द्वारा सुद्रढ़ बनाया जा सकता है और दंड के द्वारा निर्बल बनाया जा सकता है।
सीखने के अन्य नियम
#1 विविध प्रतिचारों का नियम
सीखने के विभिन्न प्रयोग से स्पष्ट होता है नवीन कार्य को सीखते समय जीव विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया करता है। यह क्रियाएं उस समय तक की जाती है, जब तक कि संतोषजनक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता है।
#2 मनोवृति का नियम
सीखने के संपूर्ण प्रक्रिया जीव की मनोवृति और तत्परता पर निर्भर करती है। हम किसी भी कर्म को उस समय तक ठीक से नहीं कर पाते है। जब तक कि हमारा दृष्टिकोण स्वस्थ एवं विकसित मनोवृति का नहीं होगा।
व्यक्ति को सीखने की ओर प्रेरित करने के लिए पूर्व अनुभव, विश्वास, मनोवृतिया आदि पूर्ण सहायता देती है। साथ ही यह निश्चित करती है कि इस कार्य को सीखने में उसे सुख मिलेगा या कष्ट।
#3 वर्णनात्मक अनुक्रिया
इस से तात्पर्य सीखने वाले के द्वारा निश्चित की गई अनुक्रिया है। जिनके प्रयोगों से सीखने में सहायता मिल सकती है। सीखते समय हम केवल वर्णनात्मक क्रियाओं का ही प्रयोग करते हैं और कष्टदायक अनु क्रियाओं को त्याग पर है। अतः वर्णनात्मक अनुक्रियाओं के द्वारा सार्थक और निरर्थक प्रतिचारों में भेद किया जा सकता है।
#4 समानता का नियम
इस नियम से तात्पर्य नवीन क्रिया सीखने के पूर्व सीखे हुए ज्ञान की सहायता लेना। जब दो परिस्थितियों में समानता होती है तो हमारे अनुभव स्वत ही स्थानांतरित होकर सीखने को और सरल बना देते है।
#5 साहचर्य परिवर्तन का नियम
यह नियम फूलों के साहचर्य द्वारा सीखने के सिद्धांत पर आधारित है। जब सीखने वाला स्वभाविक उद्दीपक के प्रति स्वाभाविक प्रतिचार करना सीख लेता है और फिर अस्वाभाविक उद्दीपक के प्रति स्वाभाविक प्रतिकार करना सीख लेता है और स्वभाविक प्रतिचार करना आरंभ करता है।
सीखने के नियमों का शैक्षिक महत्व
मानव बार-बार प्रयत्न करके एवं भूलो में सुधार करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। बालक जैसे-जैसे बड़ा होता है सीखने के क्षेत्र में उन्नति करता है। विद्वानों ने सीखने की क्षमता को बढ़ावा देने के लिए सीखने के नियमों का शैक्षिक महत्व बताया है।
#1 उद्देश्यों की स्पष्टता
शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान का उद्देश्य निश्चित स्पष्ट एवं ज्ञान उपयोगी होना चाहिए। जब छात्र इसे समझ लेगा तो स्वता ही सीखने के क्षेत्र में अपना ध्यान एकाग्र कर सकेगा।
#2 उपयुक्त ज्ञान और क्रिया चयन
छात्र की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का मूल्यांकन करने के पश्चात ही सीखने वाले को उपयुक्त ज्ञान व क्रियाविधि का चुनाव करना चाहिए। इससे छात्र को सही प्रतिचार के चुनाव में एवं अभ्यास में सफलता होती है।
#3 तत्परता जागृत करना
बालक अपने कार्य को तभी सीख सकेगा जब वह सीखने के लिए तैयार होगा। सीखने की तैयारी को तत्परता का नाम दिया जाता है। तत्परता बालक की रूचि, उत्साह, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य आदि पर निर्भर करता है।
#4 अनुभव स्थानांतरण
सीखने के नियमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मानव अनुभवों का सर्वाधिक महत्व होता है। शिक्षकों को चाहिए कि वह छात्रों को अधिक से अधिक अनुभव एकत्रित करने का अवसर दे। वह छात्रों को अनुभव की उपयोगिता नई समस्याएं व कार्य के सीखने की उपयोगिता के बारे में बताएं। इस प्रकार से बार-बार के अभ्यास व प्रयोग से छात्र स्वत ही अनुभवों का प्रयोग करना सीख जाएंगे।
#5 स्वक्रिया पर बल
सीखने के क्षेत्र में रूसो में सबसे पहले स्वक्रिया को प्रतिपादित किया था। अधिगमकर्ता को स्वयं हाथों से कार्य करके सीखना चाहिए। इससे अनुभव सुदृढ़ एवं स्थाई बनते है। अधिगमकर्ता प्रारंभ में अनर्गल और निरर्थक प्रयत्न करता है। बाद में उचित कार्य का चुनाव करके कार्य को स्वत ही सीख लेता है। इससे स्व निर्भरता का विकास होता है।
#6 प्रेरकों का प्रयोग
सीखने के नियमों से स्पष्ट है कि सीखने के लिए प्रेरकों का प्रयोग आवश्यक है। जब हम बालकों को पुरस्कार दंड, प्रशंसा एवं निंदा के द्वारा सीखने के लिए तैयार करते हैं तो वे सीखने के प्रति उत्साह एवं रुचि को प्रकट करते है। अतः उनके सीखने में शीघ्र उन्नति होती है। शिक्षकों को चाहिए की शिक्षा देते समय उत्साही प्रेरकों का प्रयोग करें। इस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में थोर्नडाईक के नियमों ने एक क्रांति उत्पन्न कर दी है। सीखना मानव विकास के लिए अनिवार्य है अतः सीखने के प्रति छात्रों को उत्साही बनाना शिक्षक का परम कर्तव्य होता है।

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