ज्ञान प्राप्ति के प्रमुख स्त्रोत



जब कोई प्रतिज्ञप्ति की अवधारणा होती है, तब प्रतिज्ञप्ति सत्य होनी चाहिए तभी वह ज्ञान का रूप लेती है। अनेक प्रतिज्ञप्तिया सत्य या असत्य हो सकती है किंतु उनकी सत्यता के विषय में हमें सटीक जानकारी नहीं होती है। हम सामान्य तौर पर इनकी सत्यता के विषय में विश्वास कर लेते हैं, किंतु सत्य में विश्वास होना ही सत्य नहीं है क्योंकि प्रमाणित करने के लिए तथ्यों की जांच आवश्यक होती है। कोई भी तथ्य जांच के पश्चात सत्य सिद्ध होता है तो वह सिद्धांत का रूप ले लेता है। ज्ञान कई प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है विशेष प्रकार से ज्ञान प्राप्ति के पांच प्रमुख स्रोत है जो नीचे वर्णित है।

#1 इन्द्रियानुभव

हमारे ज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत इन्द्रियानुभव है। हमें ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं वह इन्द्रियानुभव कहलाता है। जिस ज्ञान प्राप्ति के लिए अधिक से अधिक इंद्रियों का प्रयोग हो, वह ज्ञान स्थाई होता है।

#2 तर्क

तर्क का ज्ञान का स्त्रोत है। तर्क बुद्धि की ओर संकेत करता है, बुद्धि प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य अपना कोई मत बनाता है या किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए दो विधियों का प्रयोग कार्य के अंतर्गत किया जाता है आगमन और निगमन विधि।

आगमन विधि में उदाहरण पहले दिया जाता है, तत्पश्चात नियम बताए जाते हैं जबकि निगमन विधि में नियम पहले बताए जाते हैं और उदाहरण बाद में बताए जाते है। जैसे लकड़ी का एक टुकड़ा पानी में गिराया जाता है उसके बाद हम देखते हैं कि लकड़ी का वह टुकड़ा पानी पर तैरने लगता है। बार-बार यह प्रक्रिया दोहराने पर निष्कर्ष यही निकलता है। इससे यह साबित हो जाता है कि लकड़ी पानी पर तैरती है। उपरोक्त उदाहरण में आगमन विधि का प्रयोग किया गया है, आगमन विधि को निगमन से श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसमें उदाहरण के माध्यम से शिक्षण कार्य कराया जाता है।

#3 आप्तवचन

इस ज्ञान का स्रोत न तो बुद्धि है न ही इंद्रियां अनुभव, यदि हम अपने दिमाग पर जोर डालें तो हमें ज्ञात होगा कि हमारे आसपास ऐसा कई प्रकार का ज्ञान है, जो कि हमें ना तो इंद्रियों से प्राप्त होता है न हीं हमारी बुद्धि से।

जैसे इतिहास की पुस्तक में हमें अनेक तथ्य या कथन दृष्टिगोचर होते हैं, जिसमें से कुछ इस प्रकार है कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रतिपादन न्यूटन ने किया था। उपरोक्त तथ्य हमें तत्कालीन समय का ज्ञान प्रदान करते हैं, लेकिन क्या हम इन कथनों को सत्य मान सकते हैं, हां हम इन कथनों को सत्य मानते हैं क्योंकि इन कथनों का प्रतिपादन विशेषज्ञों विद्वानों द्वारा हो चुका है। और उनके वचनों को हम सत्य मानकर ज्ञान के रूप में ग्रहण करते हैं

#4 अन्तः प्रज्ञा

अन्तः प्रज्ञा ज्ञान का एक विशेष स्त्रोत होता है जो कि सभी मनुष्यों के पास नहीं होता है। यह हमारे मन की आवाज होती है तथा इंद्रियों से परे एक विशेष प्रकार का अनुभव होता है, जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में छठी इंद्री से जोड़ लेते है। इस प्रकार के ज्ञान में किसी विशेष व्यक्ति को कुछ घटना घटने से पहले उसका अनुभव या आभास हो जाता है। इसमें ज्ञाता और ज्ञे एक ही होता है।

#5 प्रयोगात्मक

इस प्रकार का ज्ञान हमें प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त होता है, इस प्रकार की ज्ञान की पुष्टि आने व्यक्तियों द्वारा उन्हें प्रयोग करके की जा सकती है। प्रयोग के पश्चात निष्कर्ष निकाला जाता है, इस प्रकार का अधिकतर ज्ञान हमें प्रयोगशालाओं से प्राप्त होता है।

#6 श्रुति

श्रुति का संबंध धार्मिक ज्ञान से होता है, लगभग सभी देशों में धार्मिक ग्रंथ ही श्रुति का स्रोत है। इस प्रकार के ज्ञान को आध्यात्मिक शक्तियों से जोड़ा गया है, यह ज्ञान पूर्ण आस्था के साथ स्वीकार किया जाता है और यह देश सीमा और काल में बंधा हुआ नहीं होता है। इस प्रकार के ज्ञान में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

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