वृद्धि और विकास तथा इसमें होने वाले परिवर्तन



विकास की प्रक्रिया एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, इस सृष्टि में प्रत्येक प्राणी प्रकृति द्वारा प्रदत अनुकूलन परिस्थितियों से उत्पन्न होता है, उत्पन्न होने तथा गर्भधारण की दशाएं सभी प्राणियों की प्रथक प्रथक है। बाद में मनुष्य अपने परिवार में विकास एवं वृद्धि को प्राप्त करता है, प्रत्येक बालक की विकास की प्रक्रिया में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। प्राणी के गर्भ में आने से लेकर पूर्ण पूर्णता प्राप्त होने की स्थिति मानव विकास है। मुनरो के शब्दों में कहा जा सकता है कि "परिवर्तन श्रंखला कि वह अवस्था है इसमें बच्चा भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाती है"।

विकास का अर्थ किसी बालक के मोटे पतले या बड़े भार युक्त होने से नहीं है, अपितु परिपक्वता की ओर स्थित परिस्थितियों में बढ़ने से है। यह एक प्रगतिशील तथा विकसित परिवर्तन की बढ़ती हुई स्थिति है इसमें तनिक भी विराम नहीं है, इसमें प्रगतिशील तत्व विद्यमान रहते है।

वृद्धि और विकास से संबंधित परिभाषाएं

ड्रेवर के अनुसार "विकास प्राणी में होने वाला प्रगतिशील परिवर्तन है जो किसी लक्ष्य की ओर लगातार निर्देशित होता रहता है" उदाहरणार्थ किसी भी जाति में व्यवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक उत्तर उत्तर परिवर्तन होते रहते है।

हरलॉक के अनुसार "विकास की सीमा अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है अपितु इसमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है, विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नवीन विशेषताएं एवं नवीन योग्यताएं स्पष्ट होती है"।

एच सोरेनसन के अनुसार "विकास का अभिप्राय परिपक्वता तथा कार्य परख सुधार की वह प्रक्रिया है जो संरचना एवं स्वरूप में हो रहे गुणात्मक तथा परिमाणात्मक परिवर्तनों के फल स्वरुप होती है, विकास अभिवृद्धि की अपेक्षा गुणात्मक परिवर्तन का विशिष्ट घोतक है"।

स्कीनर सी. ई. अनुसार "विकासवादी में ही विकास वृद्धि में ही प्रगति है, परिवर्तन केवल क्षेतीज समतल पर नहीं होता बल्कि ऊर्ध्वाधर परिवर्तन भी होते है। निश्चित ही प्रतिगामी परिवर्तनों की आशा की जानी चाहिए परिपक्वता की ओर की प्रगति परिवर्ती नहीं है"।

विकास में होने वाले परिवर्तन

समय के साथ साथ विकास में कई परिवर्तन होते है जो की निम्न प्रकार है-

#1 आकार में परिवर्तन

विकास में बालक के शारीरिक एवं मानसिक पक्षों में परिवर्तन देखे जाते हैं, जैसे जैसे बालक की आयु बढ़ती है उसकी ऊंचाई, भार व चौड़ाई में वृद्धि होती है। यह परिवर्तन अब अपनी स्वाभाविक गति से होते हैं इसी प्रकार से हृदय, फेफड़े, अंतरिया व पेट के आंतरिक अंगों में अभिवृद्धि होती है। इन अंगों का आकार बढ़ जाता है जिससे यह शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति भली-भांति कर सकते है। भाषा योग्यता में भी वृद्धि होती है, जैसे पहले एक अक्षर, फिर दो अक्षर तत्पश्चात बालक अन्य शब्द बोल सकता है इसी प्रकार धीरे धीरे वृद्धि होती है।

#2 अनुपात में परिवर्तन

बालक की आयु बढ़ने के साथ एक पक्षीय नहीं होती, बल्कि सभी अंगों का विकास अनुपातिक होता है जैसे किसी शिशु का जब धड़ बढ़ता है तो उसी अनुपात में हाथ तथा पैर में भी वृद्धि होती है। ऐसा नहीं है कि धड़ बढ़ जाए और पैरों में वृद्धि न हो या फिर सिर बढ़ जाए और धड़ ना बढे। मानसिक विकास में भी एक अनुपात देखा जा सकता है, शैशवावस्था में प्रारंभ में संवेगात्मक व्यवहार होता है लेकिन धीरे-धीरे इन समूहों के साथ अर्थ जुड़ने लगता है और प्रत्यक्षीकरण का विकास हो जाता है। जितनी अधिक संवेदनाएं होंगी, उसी अनुपात में प्रत्यक्षीकरण भी होगा। इसी प्रकार कल्पना, रुचि, चिंतन, निर्णय आदि का भी विकास आयु के अनुसार आनुपातिक होता है।

#3 पुरानी आकृतियों का लोप

आयु बढ़ने के साथ-साथ पुरानी आकृतियां लुप्त होने लगती है। थाइमस ग्रंथि, पीनियल ग्रंथि, बाल, दांत आदि में परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता है। जैसे शिशु के दांत गिर जाते हैं, इसी प्रकार शैशवावस्था में जो बालक तोतली बोली बोलता था उसके स्थान पर स्पष्ट बोलने लगता है ज्ञानेंद्रियां जो जन्म के समय कम सक्रिय थी उनकी आयु के साथ अधिक सक्रिय होने लग जाती है।

#4 नई आकृतियों की प्राप्ति

बालक के विकास में पुरानी आकृतियों के स्थान पर नई आकृतियां स्थान ले लेती है। उदाहरणार्थ बालक के दूध के दांत टूटने लगते हैं, उसके स्थान पर नए व स्थाई दांत आ जाते है। आयु बढ़ने पर परिपक्वता के लक्षण दिखाई देने लगते है। दाढ़ी, मूछ आना और अंगों पर बाल आना आदि। इसी प्रकार भाषा, नैतिकता, धर्म आदि सभी पक्षों में नवीन परिवर्तन दिखाई देने लगते है।

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