किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास



गंभीर उथल-पुथल का तात्पर्य संवेगात्मक विकास से है। किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास चरम सीमा पर होता है, हरलॉक ने इस अवस्था के संवेगात्मक जीवन के संबंध में लिखा है कि किशोरावस्था बढ़ी हुई संवेगात्मक तनाव की अवस्था है जो उसके शारीरिक और मानसिक परिवर्तन के कारण इस अवस्था में होता है।

बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था की अपेक्षा किशोरावस्था में संवेगात्मक अस्थिरता अपेक्षाकृत अधिक होती है। संवेगात्मक अस्थिरता का मुख्य कारण किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और रंध्रीय परिवर्तन है। किशोरावस्था में संवेग बहुत आते हुए होते हैं, अनियंत्रित होते हैं, अनियमित होते हैं लेकिन विकास के प्रत्येक वर्ष के बढ़ने के साथ-साथ संवेगात्मक विकास के प्रत्येक वर्ष अभिव्यक्ति से उन्नति दिखाई देती है।

जैसे 14 वर्ष का किशोर चिड़चिड़ा होता है, वह अक्सर जल्दी उत्तेजित हो जाता है, अपने भावों पर नियंत्रण के बजाय संभागों में उन्मुक्त हो जाता है। 1 वर्ष के बाद 15 वर्ष की आयु में किशोर संदेशों को छुपाना प्रारंभ कर देता है, वह उदास रहने लगता है। 16 वर्ष का किशोर चिंता करना कम कर देते हैं, वह अपनी सभी समस्याओं का सामना शांत मन से करना प्रारंभ कर देते है।

इस अवस्था तक वे अपने संबंधों पर नियंत्रण करना सीख जाते हैं, फलस्वरुप किशोर पूर्व किशोरावस्था की समाप्ति के साथ तनाव व तूफान भी कम हो जाता है।

किशोरावस्था में सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक

  1. शारीरिक बनावट
  2. स्वास्थ्य
  3. परिवार
  4. विद्यालय
  5. मनोरंजन
  6. व्यक्तित्व
  7. संवेगात्मक विकास

किशोरावस्था में सामान्य संवेग

#1 क्रोध

पूर्व किशोरावस्था में जब किशोर को चिढ़ाया जाता है या उसकी आलोचना की जाती है, तब उसे क्रोध आता है। इस क्रोध का किशोर जो कार्य करना होता है और उसे वह नहीं करने दिया जाता तब उसमें असहाय व द्वंद की भावना उत्पन्न होती है। वह सोचने लगता है कि माता-पिता संरक्षक और अध्यापकों आदि के नियंत्रण में है ऐसी परिस्थिति में वह क्रोधित हो जाता है। परंतु आयु बढ़ने के साथ-साथ किशोर यह महसूस करने लगता है कि क्रोध अपरिपक्वता की निशानी है, अतः वह क्रोध को नियंत्रित करना सीख जाता है।

#2 भय

किशोरावस्था के प्रारंभ में किशोर यह समझने लगता है कि जिन चीजों से वह पहले डरता था वह सभी वह सभी खतरनाक नहीं होती। इस विचारधारा के कारण बाल्यावस्था के अनेक भय खत्म हो जाते हैं और किशोरावस्था में कुछ नए प्रकार के भय उत्पन्न होते हैं जैसे अंधेरे का भय, रात में अकेले रहने का भय, बड़े समूह के सामने उपस्थित होने का भय, अजनबीयों का भय, पढ़ाई का भय, आदि।

लगभग 12 वर्ष की अवस्था तक पूर्व किशोरावस्था के भय अपनी चरम सीमा पर होते हैं तथा 16 वर्ष की अवस्था तक भय कम होने लगते है।

#3 ईर्ष्या

ईर्ष्या एक शिशु कालीन संवेग होता है, परंतु किशोरावस्था के प्रारंभ में यह अधिक मात्रा में पाया जाता है इसका प्रमुख कारण व्यक्ति में असुरक्षा की भावना माना गया है। समूह में तो लोकप्रियता पाना, विपरीत लिंग में दिलचस्पी, यह वांछित लक्ष्य प्राप्त न होने के कारण किशोरावस्था में ईर्ष्या का उदय होता है।

#4 स्नेह

स्नेह एक प्रकार का सुखद संवेग है। किशोरावस्था में किशोरों का स्नेह उन लोगों के साथ देखा गया है जिनके साथ उनके सुखद संबंध होते हैं और उनसे उसे प्यार मिलता है।

#5 हर्ष

उत्तम समायोजन की स्थिति में किशोर हर्ष का अनुभव करते है। हर्ष की दिशा में किशोर प्रसन्नता के साथ संतोष का अनुभव भी करते हैं तथा आसमान की ऊंचाई तक स्वयं को पाते है।

#6 जिज्ञासा

जिज्ञासा एक प्राकृतिक संवेग होता है जो बाल अवस्था में अधिक पाया जाता है। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते भारी सामाजिक प्रतिबंधों के कारण जिज्ञासा प्राय दब जाती है। किशोरावस्था में जिज्ञासा अधिकांशत विपरीत लिंग के लोगों के संपर्क में बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्त किशोर उच्च शिक्षा, व्यवसाय आदि के बारे में भी जिज्ञासु दिखाई देता है।

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