बाल्यावस्था की अवधारणा और विशेषताएं



बाल्यावस्था वास्तव में मानव जीवन का स्वर्णिम समय है। यद्यपि बालक का विकास 5 वर्ष तक की आयु में हो जाता है लेकिन बाल्यावस्था में विकास की संपूर्ण गति प्राप्त होती है और बालक एक परिपक्व व्यक्ति के निर्माण की ओर अग्रसर होता है।

शैशावस्था के बाद बाल्यावस्था का आरंभ होता है। यह अवस्था बालक के व्यक्तित्व के निर्माण की होती है, बालक में इस अवस्था में विभिन्न आदतों व्यवहार रुचि एवं इच्छाओं के प्रतिरूप का निर्माण होता है।

महत्वपूर्ण परिभाषाएं

#1 ब्लेयर जॉन्स व सिम्पसन के अनुसार

शैक्षणिक दृष्टिकोण के जीवन चक्र में बाल्यावस्था से अधिक कोई महत्वपूर्ण अवस्था नहीं है। जो शिक्षक इस अवस्था के बालकों को शिक्षा देते हैं, उन्हें बालकों का उनकी आधारभूत आवश्यकताओं का उनकी समस्याओं एवं उनकी परिस्थितियों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। जो उनके व्यवहार को रूपांतरित और परिवर्तित करती है।

#2 कॉल व ब्रूस के अनुसार

वास्तव में माता-पिता के लिए बाल विकास की इस अवस्था को समझना कठिन है।

#3 कप्पू स्वामी के अनुसार

इस अवस्था में बालक में अनेक अनोखे परिवर्तन होते है। उदाहरणार्थ:- 6 वर्ष की आयु में बालक का स्वभाव बहुत उग्र हो जाता है वह सभी बातों का उत्तर न या नहीं में देता है। 7 वर्ष की आयु में वह उदासीन होता है और अकेला रहना पसंद करता है, 8 वर्ष की आयु में उसमें अन्य बालकों से सामाजिक संबंध स्थापित करने की भावना प्रबल होती है। 9 से 12 वर्ष तक की आयु में विद्यालय में उसके लिए कोई आकर्षण नहीं रह जाता। वह कोई नियमित कार्य न कर के, कोई महान और रोमांच कार्य करना चाहता है।

बाल्यावस्था की विशेषताएं

#1 शारीरिक व मानसिक स्थिरता

6 या 7 वर्ष की आयु के बाद बालक शारीरिक और मानसिक विकास में स्थिरता आ जाती है। यह स्थिरता उसकी शारीरिक व मानसिक शक्तियों को दृढ़ता प्रदान करती है, फलस्वरुप उसका मस्तिष्क परिपक्वता और वह स्वयं व्यस्त सा जान पड़ता है, इसलिए रॉस ने बाल्यावस्था को मिथ्या परिपक्वता का काल बताते हुए लिखा है कि "शारीरिक और मानसिक स्थिरता बाल्यावस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।

#2 मानसिक योग्यताओं में वृद्धि

बाल्यावस्था में बालक की मानसिक योग्यताओं में निरंतर वृद्धि होती है। वह विभिन्न बातों के बारे में तर्क और विचार करने लगता है। वह साधारण बातों पर अधिक से अधिक देर तक अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है। उसमें पूर्ण अनुभव को स्मरण रखने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है।

#3 जिज्ञासा की प्रबलता

बालक की जिज्ञासा विशेष रूप से प्रबल होती है। वह जिन वस्तुओं के संपर्क में आता है, उनके बारे में प्रश्न पूछकर हर तरह की जानकारी प्राप्त करना चाहता है। उसके यह प्रश्न शेष अवस्था से भिन्न प्रकार के होते हैं वह शिशु के समान यह नहीं पूछता कि वह क्या है, इसके विपरीत वह पूछता है कि यह ऐसा क्यों है, यह ऐसा कैसे हुआ है।

#4 वास्तविक जगत से संबंध

इस अवस्था में बालक शैशवावस्था के काल्पनिक जगत का परित्याग कर वास्तविक जगत में प्रवेश करता है। वह अपनी प्रत्येक वस्तु से आकर्षित होकर ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। स्ट्रेंग के शब्दों में बालक अपने को अति विशाल संसार में पाता है और उसके बारे में जल्दी से जल्दी जानकारी प्राप्त करना चाहता है।

#5 रचनात्मक कार्यों में आनंद

बालकों को रचनात्मक कार्यों में विशेष आनंद आता है वह साधारणत: घर से बाहर कार्य करना चाहता है। इसे बगीचे में काम करना या लकड़ी से वस्तुएं बनाना, इसके विपरीत बालिका घर में ही कोई ना कोई कार्य करना चाहती है जैसे पिरोना या पढ़ाई करना।

#6 सामाजिक गुणों का विकास

बालक विद्यालय के छात्रों और अपने समूह के सदस्यों के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करता है। अतः उसमें अनेक सामाजिक गुणों का विकास होता है जैसे सहयोग, सद्भावना, सहनशीलता, आज्ञाकारी आदि।

#7 नैतिक गुणों का विकास

इस अवस्था के आरंभ में ही बालक में नैतिक गुणों का विकास होने लगता है। स्ट्रेंग के अनुसार छह, सात और आठ वर्षो के बालकों में अच्छे बुरे की ज्ञान का एवं न्याय पूर्ण व्यवहार इमानदारी और सामाजिक मूल्यों की भावना का विकास होने लगता है।

#8 बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास

शैशावस्था में बालक का व्यक्तित्व अंतर्मुखी होता है क्योंकि वह एकांत प्रिय और केवल अपने में ही रुचि लेने वाला है। इसके विपरीत बाल्यावस्था में उसका व्यक्तित्व बहिर्मुखी हो जाता है। क्योंकि बाह्य जगत में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाती है अतः वह अन्य व्यक्तियों, वस्तुओं और कार्यों का अधिक से अधिक परिचय प्राप्त करना चाहता है।

#9 संवेगो का दमन व प्रदर्शन

बालक अपने संवेगो पर अधिकार रखना एवं उसकी ओर बुरी भावनाओं में अंतर करना जान जाता है। वह उन भावनाओं का दमन करता है, जिनको माता-पिता और बड़े लोग पसंद नहीं करते।

#10 संग्रह करने की प्रवृत्ति

बाल्यावस्था में बालको और बालिकाओं में संग्रह करने की प्रवृत्ति ज्यादा पाई जाती है। बालक विशेष रूप से कांच की गोलियां, टिकट मशीनों के भाग और पत्थरों के टुकड़ों का संकेत करते है। बालिकाओं में चित्रों, खिलौनों, गुड़िया और कपड़ों के टुकड़ों का संग्रह करने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

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