चिंतन तथा चिंतन के प्रकार

चिंतन का संबंध संज्ञानात्मक तथा ज्ञानात्मक क्षेत्र से है। चिंतन एक अमूर्त संप्रत्यय है। चिंतन विचारों की एक मानसिक क्रिया है, चिंतन समस्या समाधान की प्रणाली है। चिंतन विचारों की वह मानसिक प्रिया है जो किसी समस्या से आरंभ होती है और समाधान होने पर समाप्त हो जाती है। रॉस के अनुसार चिंतन मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पहलू है।

चिंतन के साधन

  1. भाषा
  2. प्रतीक
  3. चिन्ह
  4. विचार

चिंतन के प्रकार

#1 मूर्त चिंतन / प्रत्यक्षीकरण चिंतन

प्रत्यक्षीकरण चिंतन से तात्पर्य किसी वस्तु को प्रत्यक्ष देखने के बाद मानसिक विचार करते हैं तो उसे प्रत्यक्षीकरण चिंतन कहा जाता है। जैसे - आम को देखने के बाद उसके स्वाद के बारे में सोचना। अथार्थ प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देने वाली विषय वस्तु के बारे में किया जाने वाला चिंतन मुर्त चिंतन कहलाता है। यह चिंतन की सबसे सरल विधि है।

#2 अमूर्त चिंतन

यह चिंतन का सबसे विकसित रूप है जो वस्तु या जिस वस्तु का ज्ञान पांच इंद्रियों से प्राप्त नहीं हो पाता है उसके बारे में मानसिक क्रिया करके समाधान ढूंढना। जैसे - काले रंग को देखकर विरोध के बारे में सोचना, लाल रंग को देखकर प्राथमिक सहायता और रेड क्रॉस के बारे में सोचना, गुलाबी रंग को देखकर आत्मसमर्पण के बारे में सोचना।

#3 सृजनात्मक चिंतन

सृजनशील / रचनाशील / अपसारी चिंतन। सृजनशील चिंतन से तात्पर्य नवीन अथवा मौलिक चिंतन के सर्जन करने से है। सर्जनशील चिंतन की तीन प्रमुख शर्ते होती है - मौलिक / अनोखा / सबसे अलग तथा नवीनता और उपयोगिता। सृजनात्मक चिंतन विभिन्न प्रकार की घटनाओं विश्लेषण और व्याख्या और समस्यात्मक परिस्थितियों से उत्पन्न होता है।

#4 तार्किक चिंतन

तर्क के आधार पर किया जाने वाला चिंतन तार्किक चिंतन कहलाता है। जैसे - गणित के पर आधारित सवाल हल करना। जॉन डेवी ने इस चिंतन को विचारात्मक चिंतन कहा है।

अधिगम और चिंतन

अधिगम में अभिप्रेरणा के बाद चिंतन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षक को चिंतन का विकास करने के लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए -

  • प्रत्यक्षीकरण और अनुभव का विकास
  • रटने की प्रवृत्ति पर रोक
  • भाषा के विकास पर बल
  • जिज्ञासु व्यवहार का निर्माण
  • संप्रत्य निर्माण पर ध्यान
  • रूचि के अनुसार अधिगम
  • वाद विवाद का अवसर देना
  • आधुनिक शिक्षण विधियां

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