अध्ययन क्षेत्र का महत्व

अध्ययन क्षेत्र को अंग्रेजी भाषा में डिसीप्लिनरी कहते हैं। डिसीप्लिनरी शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा discipulas शब्द से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षार्थी तथा डिसीप्लस शब्द के समानार्थी एक अन्य शब्द है disciplina जिसका अर्थ है शिक्षण। सामान्य अर्थों में हम इसका तात्पर्य स्पष्ट करें तो हमारे सामने एक नया कथन दृष्टिगोचर होता है "शिक्षार्थी के लिए शिक्षण कार्य कराना"।

क्रिया या व्यवहारिक रूप में इसका अर्थ हम अनुदेशन से लेते हैं। उपरोक्त अर्थ से स्पष्ट होता है कि शैक्षिक अध्ययन में वे सभी तत्व शामिल होते हैं जो कि अध्ययन क्षेत्र के अर्थ को स्पष्ट करते हैं। साथ ही यह एक तकनीकी शब्द है जो कि अधिगम के उत्पादन में सहायक होता है।

19वीं शताब्दी में जर्मन विश्वविद्यालय की शैक्षिक संस्थाओं के द्वारा सर्वप्रथम अध्ययन शब्द का प्रयोग किया गया, तत्पश्चात बीसवीं शताब्दी में अध्ययन को धीरे-धीरे अन्य देशों ने भी अपना लिया तथा उनकी प्रकृति एवं विशेषता के अनुरूप उनको अलग-अलग विषयों में विभक्त किया गया।

जैसे - सामाजिक अध्ययन विषय में समाहित विषयों को कक्षा के आगे पढ़ने के साथ ही स्वतंत्र रूप से अपना लिया जाता है। इतिहास, समाजशास्त्र नागरिक शास्त्र भूगोल एवं अर्थशास्त्र इन सभी विषयों को स्वतंत्र रूप से अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है, क्योंकि इन विषयों की प्रकृति विशेषता क्षेत्र आदि एक दूसरे से कुछ हद तक बंद है।

अध्ययन क्षेत्र का महत्व

#1 सामाजिक संदर्भ में एक विषय के रूप में

हम समाज में रहते हैं और समाज के द्वारा ही हम अपना विकास और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। तथा समाज का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की हमें आवश्यकता महसूस होती है तथा हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि हमें अनेक ऐसे विषयों की जरूरत पड़ती है जिनका हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है। यह विषय व्यापक रूप से सामाजिक विकास के बारे में अपना योगदान देते हैं।

जैसे - सामाजिक विज्ञान एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसका अध्ययन क्षेत्र क्रमशः इतिहास, समाजशास्त्र, नागरिक शास्त्र, भूगोल, अर्थशास्त्र माना जाता है। इन विषयों की जानकारी प्राप्त करके हम अपने दैनिक जीवन की कई आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा यह विषय प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से समाज को प्रभावित करते हैं।

#2 शैक्षिक संदर्भ में महत्व

वैदिक काल में मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार शिक्षण विषय प्रचलन में थे। जैसे - धर्म से संबंधित ज्ञान एवं युद्ध कौशल आदि उस समय का जो समाज या उसकी आवश्यकता इन विषयों के द्वारा ही पूरी होती थी। उस समय समाज में दो वर्गों का वर्चस्व था - ब्राह्मण वर्ग तथा क्षत्रिय वर्ग तथा इन दोनों वर्गों की आवश्यकता के अनुसार शिक्षण कार्य संचालित होता था।

लेकिन समय के साथ बदलते परिवेश में इन विषयों की आवश्यकता समाप्त होती चली गई और इनके स्थान पर अनेक नवीन विषयों ने अपनी जगह बना ली तथा वे सभी शिक्षा की दृष्टि से संपूर्ण महत्वपूर्ण समझे गए और शैक्षिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए गए तथा समय के साथ-साथ उनका अध्ययन क्षेत्र भी बढ़ता चला गया।

#3 व्यवसायिक संदर्भ में महत्व

प्रत्येक अध्ययन विषय यह निश्चित करता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की शक्ति का उपयोग किसी न किसी स्तर पर करेगा। अतः प्रत्येक अध्ययन क्षेत्र का किसी न किसी व्यवसाय से संबंध होता है। जैसे - वर्तमान समय में तकनीकी क्षेत्र अध्ययन का एक नवीन विषय है, जिसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है तथा बड़ी संख्या में लोग इस में कार्य करते हैं। जैसे - तकनीकी विशेषज्ञ, तकनीकी कर्मचारी, इंजीनियर, मशीनरी संचालक, योजना निर्माता आदि। प्रत्येक अध्ययन विषय की कड़ी दूसरे अध्ययन विषय से जुड़ी हुई होती है तथा व्यवसायिक दृष्टि से सभी महत्वपूर्ण होते हैं।

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