#1 निरंतरता का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार विकास की प्रक्रिया अभिराम गति से निरंतर चलती रहती है, यह गति कभी तीव्र तो कभी मंद होती है। उदाहरणार्थ प्रथम 3 वर्ष में बालक के विकास की प्रक्रिया बहुत तीव्र होती है। इसी प्रकार शरीर के कुछ भागों का विकास तेज तो कुछ भागों का मंद गति से होता है, पर विकास की प्रक्रिया चलती अवश्य रहती है।
#2 गति का सिद्धांत
डग्लस व होलेंड ने यह सिद्धांत का स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है कि विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति में विभिन्नता होती है और यह विभिन्नता विकास के संपूर्ण काल में यथावत बनी रहती है। उदाहरणार्थ जो व्यक्ति जन्म के समय लंबा होता है वह साधारणत: बड़ा होने पर भी लंबा होता है और वह जो छोटा होता है वह साधारणत छोटा ही रहता है।
#3 कर्म का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार बालक का गामक और भाषा संबंधी आदि विकास एक निश्चित क्रम में होता है। सरले, प्याजे, एमिस तथा गैसेल आदि के परीक्षण में यह बात सिद्ध करती है कि बालक का विकास क्रम से ही होता है। उदाहरणार्थ 32 से 36 माह का बालक व्रत को उल्टा, 60 माह का बालक सीधा तथा 72 माह का बालक फिर उल्टा बनाता है। इसी प्रकार जन्म के समय वह केवल रोना जानता है, 3 माह में वह गले से एक विशेष प्रकार की आवाज निकालने लगता है तथा 7 माह में माता-पिता के लिए कुछ शब्दों का प्रयोग करने लगता है।
#4 दिशा का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार बालक का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है। उदाहरणार्थ अपने जीवन के प्रथम सप्ताह में बालक केवल अपने सिर को उठा पाता है, पहले 3 माह में वह अपने नेत्रों की गति पर नियंत्रण करना सीख जाता है, 6 माह में वह अपने हाथों की गतियों पर अधिकार कर लेता है, 9 माह में वह सहारा लेकर बैठने लगता है, 12 माह में वह स्वयं बैठने व घिसट कर चलने लगता है, 1 वर्ष का होने पर उसे अपने पैरों पर नियंत्रण होने लगता है और वह खड़ा होने लगता है। इस प्रकार जो शिशु अपने जन्म के प्रथम सप्ताह में केवल अपने सिर को उठा पाता था, वह 1 वर्ष के बाद खड़ा होने और 18 माह के बाद चलने लगता है।
#5 एकीकरण का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार बालक पहले संपूर्ण अंगो और फिर उनके भागों को चलाना सीखता है। उसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। उदाहरणार्थ वह पहले पूरे हाथ को फिर अंगुलियों को और फिर हाथ व अंगुलियों को एक साथ चलाना सीखता है। कुकूस्वामी ने लिखा है कि विकास में कौन से अंगों की ओर से पूर्ण की ओर गति निहित रहती है। विभिन्न अंगों का एकीकरण ही गतियों की सरलता को संभव बनाता है।
#6 परस्पर संबंध का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार बालक की शारीरिक मानसिक संवेगात्मक आदि पहलुओं के विकास में परस्पर संबंध होता है। उदाहरणार्थ जब बालक का शारीरिक विकास के साथ-साथ उसकी रूचियों ज्ञान के केंद्रीकरण और व्यवहार में परिवर्तन आता है। उसी के साथ साथ उसमें गायक और भाषा संबंधी विकास भी होता है। गैरिसन का कथन है कि शरीर संबंधी दृष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर संबंध पर बल देता है।
#7 व्यक्ति विविधताओं का सिद्धांत
प्रत्येक बालक को बालिका के विकास का अपना स्वयं का स्वरूप होता है। इस स्वरूप में व्यक्तिगत विभिन्नताए पाई जाती है, एक ही आयु के दो बालको और बालिकाओं, एक बालक और बालिका के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि विकास में व्यक्तिगत विभिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। स्किनर का मानना है कि विकास के स्वरूपों में व्यापक व्यक्तिगत विभिन्नता होती है।
#8 समान प्रतिमान का सिद्धांत
इस सिद्धांत का अर्थ स्पष्ट करते हुए हरलॉक लिखता है प्रत्येक जाती चाहे वह पशु जाती हो या मानव जाति अपनी जाति के अनुरूप विकास के प्रतिमान का अनुसरण करती है। उदाहरणार्थ संसार के प्रत्येक भाग में मानव जाति के शिशु के विकास का प्रतिमान एक ही है और उसमें किसी प्रकार का अंतर होना संभव नहीं है।
#9 सामान्य एवं विशिष्ट प्रतिक्रियाओं का सिद्धांत
बालक का विकास सामान्य प्रतिक्रियाओं की ओर होता है। उदाहरणार्थ नवजात शिशु अपने किसी अंग का संचालन करने से पूर्व अपने शरीर का संचालन करता है और किसी विशेष वस्तु की ओर संकेत करने से पूर्व अपने हाथों को सामान्य रूप से चलाता है। हरलॉक का कथन है कि विकास की सभी अवस्थाओं में बालक की प्रतिक्रियाएं विशिष्ट बनने से पूर्व सामान्य प्रकार की होती है।
#10 वंशानुक्रम एवं वातावरण की अनुक्रिया का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार बालक का विकास न केवल वंशानुक्रम के कारण और ना केवल वातावरण के कारण वरन दोनों की अंतः क्रिया के कारण होता है। स्कीनर ने लिखा है कि यह सिद्ध किया जा चुका है कि वंशानुक्रम उन सीमाओं को निश्चित करता है जिनके आगे बालक का विकास नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार यह भी प्रमाणित किया जा चुका है कि जीवन के प्रारंभिक वर्षों में दूषित वातावरण कुपोषण व कमी रोग गंभीर युक्त रोग जन्मजात रोग योग्यता को कुंठित बना सकते है।

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