लिंग गैर बराबरी के प्रमुख कारण



कमला भसीन ने लिंग के बारे में बड़ा सुगम व सुंदर तथा तार्किक स्पष्टीकरण दिया है। उनका कहना है कि पिछले दिनों देश ने बहुत अधिक प्रयास आधुनिकता और विकास से होने वाले प्रभाव को औरतों और पुरुषों के मध्य समानता के संदर्भ में देखना है। वह यह भी कहते हैं कि इतिहास सिर्फ पुरुषों की कहानी है, समुचित तस्वीर पाने के लिए हमें औरतों की कहानी भी चाहिए।

लिंग गैर बराबरी के कारण और रोकने के उपाय

इंग्लैंड और अमेरिका में जहां लंबे समय से शिक्षा रही है और जिन्हें आधुनिक और समानता पूर्ण माना जाता है कि समाजों पर हम अगर नजर डालते हैं तो वहां लिंग गैर बराबरी अब तक मौजूद है। पुरुषों को अब भी घर का मुखिया समझा जाता है, इन समाजों में लगभग 50% औरतें पतियों के हाथों शारीरिक हिंसा का शिकार बनती है। इन देशों में घर के बाहर शारीरिक हिंसा की घटनाएं बहुत अधिक होती है। अमेरिका में बराबर मजदूरी वेतन कानून पास होना अब तक बाकी है।

एन ओकली कहते हैं कि सभी देशों में अधिकांश देशों में बड़ा स्पष्ट लिंग भेदभाव मौजूद है। अधिकांश औरतें कपड़ा व पोशाक उद्योग से जुड़ी हुई है, हमारे देश में विकास कार्यक्रम पिछले 50 वर्षों से चल रहे हैं लेकिन लिंग व विकास पर चर्चा पिछले 10-15 वर्षों में ही शुरू हुई है। इस विषय पर कई सेमिनार हुए, लेकिन देखा गया है कि योजनाबद्ध विकास की सभी कोशिश जिनका उद्देश्य पूरे समुदाय के जीवन में सुधार लाना था, औरतों का कोई भला नहीं कर रहे है।

विशाल साहित्य होने के बाद भी समाजशास्त्री यह तथ्य से सहमत नहीं है कि इस गैर बराबरी का क्या कारण है। वे यह भी नहीं बता पाते कि इस गैर बराबरी को कैसे समाप्त किया जाए. अनुसंधान में जोर दिया जाता है कि लिंग गैर बराबरी की अपेक्षा पुरूष व स्त्री में इतना अंतर क्यों है। इसके प्रमुख निम्न कारण है।

#1 मूलभूत महिलावाद

समाज में गैर बराबरी का कारण लिंग रहा है। मूलभूत महिला वादियों का कहना है कि इतिहास में हमेशा पुरुषों में स्त्रियों का शोषण किया जाता है। स्त्रियों का शोषण इसलिए हुआ है कि वे बिना किसी आर्थिक भुगतान के स्त्रियों से काम लेते हैं, स्त्रियां बच्चों का पालन पोषण करती है, उन्हें कभी भी शक्ति के स्थानों पर पहुंचने नहीं दिया जाता है।

#2 समाजवादी महिलावाद

समाजशास्त्र में एन आर देसाई मानते हैं कि हमारे यहां ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों का शोषण होता है। वस्तुतः स्त्रियों के शोषण में वृद्धि हुई है।

#3 उदार महिलावाद

उदार महिला वाद के क्षेत्र में स्पष्ट रूप से विकसित कोई सिद्धांत नहीं है, जो लिंग गैर बराबरी का विश्लेषण कर सके। उदार महिलावाद राजनीति आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में धीरे-धीरे परिवर्तन लाना चाहता है। यह पहनावे और खान-पान के क्षेत्र में बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अब शहरों और गांवों में लड़कियां जींस पहन सकती है, खान-पान के क्षेत्र में भी गैर बराबरी कम हो रही है। अब तो एक ही दरी पर बैठकर या खाने की मेज पर बैठकर एक ही खाने को पुरुष व स्त्री दोनों खाते है।

#4 जाति महिलावाद

भारत की जाति व्यवस्था में पुरुष व स्त्री बराबरी बहुत अधिक है। उच्च जातियों में तो स्तरीय पंचायत में कोई भागीदारी नहीं कर सकती, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी पुरुषों के टक्कर की है। आम स्त्रियां पुरुषों के बराबर के प्रशासनिक पदों पर काम कर रही है।

#5 उत्तर आधुनिक महिलावाद

उत्तर आधुनिक महिलावाद पुरुष स्त्री के अंतर पर जोर देता है। वे पुरुषों चित्र और स्त्रियों चित्र अंतर को स्वीकार करते हैं, वास्तव में देखा जाए तो अभी भारत में उत्तर आधुनिकता नहीं आई है लिंग की गैर बराबरी पर आंदोलन और चिंतन बराबर चल रहे है। किसी भी सभ्य समाज में लिंग की गैर बराबरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वास्तव में देखा जाए तो स्त्रियों की परिस्थिति और पुरुषों की परिस्थिति के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए और यही लिंग की अवधारणा है।

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