मानव में मानसिक विकास


 

मानव का बौद्धिक और मानसिक विकास बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। मानसिक विकास का अर्थ है की मानसिक विकास अथवा बौद्धिक विकास से तात्पर्य बालक के उन मानसिक योग्यताओं और क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरंतर बदलते हुए वातावरण में ठीक प्रकार से समायोजन करता है और उलझनपूर्ण समस्याओं को सुलझाने में अपने मानसिक शक्तियां को पूरी तरह समर्थ पाता है।

मानसिक विकास की परिभाषाएं

जेम्स ड्रेवर के अनुसार व्यक्ति के जन्म से परिपक्वता तक मानसिक क्षमताओं एवं मानसिक कार्यों के उत्तरोत्तर प्रकरण एवं संगठन की प्रक्रिया को मानसिक विकास कहते हैं।

रेवर के अनुसार मानसिक विकास का तात्पर्य संगणक विकास के उन सभी प्रणाली परिवर्तनों से है जो समय बीतने के साथ व्यक्ति में घटित होते हैं।

मानसिक विकास की विशेषताएं

मानसिक विकास कई अवस्थाओं से होकर गुजरता है। मनोवैज्ञानिको ने इन अवस्थाओं को तीन भागों में बांटा है। सहन प्रक्रिया अवस्था, एच्छिक प्रक्रिया अवस्था, उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया अवस्था।

आयु की दृष्टि से मानसिक विकास को निम्नलिखित भागों में बांटा गया है।

शैशवास्था : जीरो से पांच वर्ष की आयु तक।

बाल्यावस्था : 6 से 11 वर्ष की आयु तक।

किशोरावस्था : 12 से 19 वर्ष की आयु तक।

प्रौढ़ावस्था : 19 वर्ष की आयु से आगे।

मानसिक विकास सरल से जटिल की ओर निम्न अनुसार होता है। मानसिक विकास की दूसरी विशेषता सरल से जटिल की ओर है। इसके अनुसार संवेदना पहले होता है, बाद में प्रत्यक्षीकरण और तत्व उपरांत निरीक्षण।

मानसिक विकास विविधता के सिद्धांत पर आधारित होता है। प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक क्षमता और रुचि भिन्न होती है। अतः मानसिक विकास का स्वरूप दिशा भी भिन्न भिन्न होती है। क्रो एण्ड क्रो ने कहा है कि मानसिक अभिवृद्धि तथा विकास सभी व्यक्तियों में एक सामान प्रति दृष्टा का अनुभव नहीं करता।

मानसिक विकास वातावरण तथा आनुवांशिकता द्वारा प्रभावित होता है, मानसिक विकास, अनुवांशिकता तथा वातावरण में सर्वाधिक प्रभावित होता है।वीनस आर के अनुसार अनुवांशिकता व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओं का पूर्ण योग है। जिन साइट के अनुसार जो किसी एक वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए हैं तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है, वह वातावरण होता है।

मानसिक विकास तथा परस्पर अन्य विकास संबंधित होते हैं। व्यक्ति का मानसिक विकास तथा शारीरिक विकास परस्पर संबंधित होते हैं। कहा गया है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है, इसी प्रकार भावात्मक, संज्ञानात्मक तथा सामाजिक विकास भी मानसिक विकास से संबंधित है।

शैशावस्था में मानसिक विकास

जन्म से प्रथम सप्ताह

जन्म से प्रथम सप्ताह में नवजात शिशु का व्यवहार मूल प्रवृत्तियाँ द्वारा संचालित होता है, उसमें बुद्धि उपयोग करने की क्षमता नहीं होती है। शारीरिक पुष्टि के लिए। कुछ न कुछ कार्य करता है, जैसे भूख, अनुभव होने पर रोना, सर्दी में कांपना, गर्मी से व्याकुल होना, तेज आवाज में चौंकना, आदि।

द्वितीय सप्ताह

9 - 10 दिन का शिशु प्रकाश चमकने वाली और बड़े आकार की वस्तुओं को एकटक देखता है।

प्रथम माह

शिशु भूख या कष्ट अनुभव होने पर विभिन्न प्रकार से चिल्लाता है।

द्वितीय माह

शिशु आवाज को ध्यान से सुनने लगता है जिधर से आवाज आती है उधर सिर घूमाने लगता है। विभिन्न शहरों की दुनिया उत्पन्न करता है।

तृतीय माह

माँ को देखकर प्रसन्न होने लगता है और वस्तुओं को पकड़ने के लिए आगे हाथ बढ़ाता है।

चतुर्थं माह

शिशु सब व्यंजनों की। धुनिया करने लगता है वस्तु पास आने पर उसे पकड़ने का प्रयास करता है।

पंचम माह

माँ को अच्छी तरह पहचानने लगता है और वस्तुओं को पकड़ने के लिए आगे हाथ बढ़ाता है।

छठा माह

सहारा देने पर बैठने लगता है। किसी आवाज का अनुकूलन करने लगता है, प्रेम व क्रोध में अंतर जानने लगता है।

सातवाँ माह

मुँह से विभिन्न प्रकार के स्वर निकालने की क्षमता आ जाती है। वह खिलौनों को पहचानने लगता है।

आठवां माह

अपनी रुचि का खिलौना चुनकर उठाने की क्षमता का विकास होता है, खिलौना छीनने पर रोने लगता है और घुटनों के बल चलने लगता है।

नवा माह

शिशु अपने आप बैठने लगता है और कोई कार्य करने का प्रयास करने लगता है।

10 वां माह

दूसरे शिशुओं की गति का तथा विभिन्न प्रकार की आवाजों का अनुकरण करने लगता है। ढकी हुई वस्तुओं को खोलने का प्रयास करता है।

12 माह

छोटे छोटे शब्दों को बोलने का प्रयास करता है। माता पिता तथा भाई बहन की क्रिया का अनुकरण करता है, धीरे धीरे चलने का प्रयास करता है।

दूसरा वर्ष

शिशु दो शब्दों के बाइक के बोलने लगता है, चित्र में कोई चीज़ पूछने पर उसे बताने लगता है।

तीसरा वर्ष

शिशु पांच सात शब्दों के वाक्य बना लेता है, संख्याओं को दोहराता है, वस्तुओं को यथा स्थान रखता है तथा सीधी रेखा खींचने का प्रयास करता है।

चौथा वर्ष

शिशु छोटे बड़े को समझने लगता है, चित्रों के बारे में प्रश्न पूछने लगता है, 10 तक गिनती याद कर लेता है, अक्षर लिखने लगता है, और वस्तुओं को क्रम में लिखता है।

पांचवां वर्ष

पांचवें वर्ष के दौरान शिशु बड़े वाक्यों को बोलने लगता है। मूर्त रंगों को पहचानता है तथा बड़े व छोटे व हल्के भारी काम का ज्ञान होने लगता है।

बाल्यावस्था में मानसिक विकास

बाल्यावस्था में मानसिक विकास की गति अधिक तेज होती है। बालक की मानसिक क्रियाएं में परिपक्वता दिखाई पड़ती है।

छठा वर्ष

इस अवस्था में बालक सार्थक प्रश्नों का सही उत्तर देने लगता है। उसमें स्मरण शक्ति एवं कल्पनाशक्ति का पर्याप्त विकास हो जाता है तथा भाषा का कुशलतापूर्वक प्रयोग करने लगता है।

सात वर्ष

बालक छोटी छोटी घटनाओं का वर्णन कर लेता है, वस्तुओं में समानताएं और अंतर बताता है संदेश ला एवं ले जा सकता है।

आठ वर्ष

बालक छोटी छोटी सामान्य समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित कर लेता है कहानियाँ कविताएँ याद कर लेता है।

नव वर्ष

बालक समेत तीन तारीख, वर्ष आदि बताने लगता है उसे सिक्कों का ज्ञान हो जाता है। बालक को रुपए, पैसे मिलना, जोड़ना, घटाना, दिन, तारीख, महीना, वर्ष आदि का ज्ञान हो जाता है।

10 वर्ष

बालक धूर्त गति से बोलने का प्रयास करता है दैनिक जीवन के नियमित कार्य करने लगता है, वह सही ढंग से निरीक्षण और तार्किक चिंतन करने लगता है।

11 वर्ष

वह उलटी गिनती तथा पुनरावृत्ति कर सकता है, साधारण गद्यांश पढ़कर उसका सारांश बता सकता है। छोटी छोटी वस्तुओं तथा घटनाओं की तुलना कर सकता है किसी घटना का कारण बता सकता है।

12 वर्ष

बालक में तर्क एवं समस्या को हल करने की योग्यता का विकास हो जाता है। वह विभिन्न परिस्थितियों की वास्तविकता को जानने का प्रयत्न करता है। कठिन शब्दों की व्याख्या करने लगता है, दूसरे बालकों को सलाह देने लगता है। वह देखी हुई वस्तुएं घटना के बारे में 75% तक बता सकता है।

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक

वंशानुक्रम, परिवार का वातावरण, स्वास्थ्य, माता पिता की शिक्षा, बालक की शिक्षा, अध्यापक, समाज,परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

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