अभिवृद्धि और विकास में संबंध तथा संज्ञान



अधिगम किसी भी व्यक्ति के विकास का परिचय है। जो व्यक्ति जितना अधिक सीखता है, उतना ही विकसित कहा जाता है। आयु जैसे-जैसे बढ़ती है, बालक अनुभवों के साथ-साथ अपने व्यवहारों में परिवर्तन एवं परिवर्तन करता है, वस्तुतः इसे ही सीखना कहते है। इस पर वातावरण का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण के लिए एक लड़की या लड़के को स्वयं कार्य करने का भरपूर अवसर दिया जाता है तो उसमें सीखने की क्षमता उस लड़के या लड़की से अधिक होगी, जिसे अवसर ही नहीं मिलता। इस कारण सुविधा संपन्न परिवारों के बच्चे में सीखने की क्षमता सामान्य परिवार के बच्चे से अधिक पाई जाती है।

अभिवृद्धि और विकास में वास्तविक सम्बन्ध

वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करते समय व्यक्ति आवश्यकता अनुसार अपने व्यवहारों में परिवर्तन करता है, जिसके कारण वह सीखता है। पर्यावरण विकास के कारणों को उत्पन्न करने में सक्षम भूमिका निभाता है, विकास के दो कारण होते हैं परिपक्वता और अधिगम।

परिपक्वता का अर्थ है बालक के आंतरिक अंगों का समुचित विकास तथा वंचित शक्ति का वह सामर्थ्य प्राप्त करना। उदाहरण के लिए 10 वर्ष का एक बालक यदि उस अवस्था के लिए आवश्यक कार्यों को करने की क्षमता नहीं रखता है, थक जाता है या असमर्थ होता है तो उसे शारीरिक रूप से अपरिपक्व कहते है।

इस प्रकार मानसिक, सामाजिक की असामयिक परिपक्वता भी होती है। गेसेल ने कहा है कि कालचक्र द्वारा सेवित व्यक्ति के स्वर या जो सामूहिक रूप से वंश परंपरा का प्रभाव पढ़ता है, वह परिपक्व है। वंश परंपरा मनुष्य के अंदर में भले ही विद्यमान हो लेकिन जब तक उसे अनुकूल पर्यावरण नहीं मिलेगा, उसका विकास नहीं होगा।

उदाहरण के लिए एक बालक में आध्यात्मिक अनुवांशिक गुण है और उसी के अनुरूप पर्यावरण दे दिया जाए तो विकास द्रुतगति से होता है। परिपक्वता का अर्थ विकास को एक निश्चित लक्ष्य की ओर ले जाना है, जिसमें व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक योग्यता आ जाए।

संज्ञान क्या होता है ?

बालक के संज्ञान का आशय उसके ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया से है, जो जन्म के समय से ही प्रारंभ हो जाती है। बालक इस भौतिक जगत में पदार्पण करने ही उसके संज्ञान विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। बालक अपने विभिन्न अंगों एवं ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से संज्ञान प्राप्त करता है तथा अपने मानसिक विचारों की कसौटी पर परखता है।

जब बालक रो रहा होता है, तब माता के आने की आवाज सुनता है तत्पश्चात माता उसको दूध पिलाती है। इस प्रकार उसकी भूख शांत होती है और उसे सुखद अनुभव होता है। धीरे-धीरे बालक समझने लगता है कि उसके रोने पर माता की आवाज का आना और उसको दूध प्राप्त करने में संबंध है। इस संबंध को बालक मस्तिष्क में रखकर धीरे-धीरे यह विचार करता है कि यह आवाज उसकी माता की है इस प्रकार माता की आवाज को पहचानने की क्रिया उसके संज्ञान को सूचित करती है कि इसी प्रकार बालक जन्म से लेकर बाल्यावस्था तक अनेक संवेदन को ग्रहण करते हुए अपने तर्क चिंतन स्मृति के आधार पर संज्ञानात्मक विकास को प्राप्त करता है।

मानव का यह विकास एक अनवरत प्रक्रिया के रूप में चलता रहता है। संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया में संवेदना और प्रत्यक्षीकरण की अहम भूमिका होती है। शैशवावस्था में ज्ञान प्राप्ति के साधन प्रमुख संवेदनाओं द्वारा ज्ञानात्मक विकास होता है। संज्ञानात्मक विकास की प्रथम सीढ़ी संवेदना को माना जाता है इसके बाद बालक तर्क चिंतन एवं स्मृति द्वारा इसका प्रत्यक्षीकरण करता है। इसमें मस्तिष्क का प्रमुख योगदान होता है जब कोई संवेदना विभिन्न भागो से गुजरने के बाद ज्ञान के रूप में विकसित हो जाती है तब उसे संवेदना का नाम नहीं दिया जाता।

बालक को खटाई खाने को दी जाती है, तब उसे मात्र खट्टे पन की संवेदना का अनुभव होता है। इसके पश्चात वह अन्य माध्यम से यह अनुभव करता है कि यह खटाई इमली की है। इसके बाद वो इमली की खटाई, नींबू की कटाई व आम की खटाई में अंतर करना सीख जाएगा और उसके ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत हो जाएगा।

शैशवावस्था के संज्ञानात्मक विकास में प्रमुख योगदान सम्मेलना का होता है, जिसके माध्यम से बालक अपने संज्ञानात्मक विकास को प्रारंभ करता है। शैशवावस्था एवं व्यवस्था की प्रमुख संवेदन का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है।

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